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  • Bhakti Yatra: एक Spiritual Ride जो दिल की धड़कन को “शांत” और आत्मा को “मज़बूत” कर देती है

    Bhakti Yatra: एक Spiritual Ride जो दिल की धड़कन को “शांत” और आत्मा को “मज़बूत” कर देती है

    Bhakti Yatra: एक Spiritual Ride जो दिल की धड़कन को “शांत” और आत्मा को “मज़बूत” कर देती है

    (छत्रपती संभाजीनगर – Old City के पुराने महादेव मंदिरों की यात्रा)

    कुछ यात्राएँ रास्तों पर नहीं चलतीं… वे मन के भीतर चलती हैं।
    और कुछ राइड्स सिर्फ बाइक/स्कूटी की आवाज़ नहीं होतीं—वे जिंदगी की आवाज़ को धीमा कर देती हैं।

    आज की यह पोस्ट एक ऐसी ही यात्रा की कहानी है—Bhakti Yatra, एक Spiritual Ride, जिसमें हम छत्रपती संभाजीनगर (Aurangabad) के पुराने शहर (Old City) के भीतर और आसपास मौजूद पुराने/प्रसिद्ध महादेव मंदिरों की ओर निकलते हैं। यह कोई “टूर प्लान” नहीं—यह एक भावना है। एक अनुभव। एक रीसेट।

    कभी आपने महसूस किया है—भीड़ में रहते हुए भी मन अकेला हो जाता है?
    कभी आपने चाहा है कि बस 10 मिनट ऐसे मिल जाएँ जहाँ दिमाग की “हजार आवाज़ें” बंद हो जाएँ?
    कभी लगा है कि सब कुछ आपके कंट्रोल में होने के बाद भी भीतर कुछ टूट-सा रहा है?

    ऐसे ही किसी समय में, बिना ज्यादा सोचे, बस एक लाइन निकलती है—
    “महादेव… संभाल लेना।”
    और फिर… आप खुद को एक मंदिर के सामने खड़ा पाते हैं।


    1) Old City की सुबह: जब सड़कें भी “ॐ” बोलती हैं

    Old City की सुबह का अपना जादू है।
    गली के नुक्कड़ पर चाय की केतली की सीटी, कहीं दूर से आती मंदिर की घंटी, दुकानें खुलती हैं, लोग काम पर निकलते हैं… और इस सबके बीच, मन में एक अलग-सी शांति उतरने लगती है।

    आप हेलमेट ठीक करते हैं, बाइक स्टार्ट करते हैं, और खुद से कहते हैं—
    “आज नहीं भागना है… आज बस महसूस करना है।”

    यह वही शहर है जहाँ इतिहास सांस लेता है। जहाँ पुराने पत्थरों में भी कहानी होती है। और जहाँ शिवालय सिर्फ इमारत नहीं, आस्था का ठिकाना होते हैं।

    Bhakti Yatra की शुरुआत अक्सर किसी “तैयारी” से नहीं होती।
    यह शुरुआत होती है एक हल्के-से भाव से—
    “चलो… आज महादेव के पास।”


    2) इस यात्रा का मकसद: “मन” का मैकेनिक बनना

    हम रोज़ शरीर का ध्यान रखते हैं—खाना, पानी, नींद…
    पर मन?
    वो कहीं पीछे छूट जाता है—मीटिंग्स, पैसे, जिम्मेदारियाँ, टेंशन, तुलना… और एक दिन अचानक मन कह देता है:
    “बस… अब नहीं।”

    Bhakti Yatra वही जगह है जहाँ मन को मरम्मत की जरूरत नहीं पड़ती—वो खुद ही ठीक होने लगता है।
    क्यों?

    क्योंकि मंदिर में जाकर आपको कोई “परफेक्ट” बनने नहीं कहता।
    महादेव के सामने आप जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार हो जाते हैं।
    आपकी कमजोरी भी, आपकी ताकत भी।

    और एक बात…
    महादेव की सबसे बड़ी सीख है—
    जो टूटता है, वही तो फिर से बनता है।
    शिव “संहार” के देव हैं, लेकिन उनका संहार विनाश नहीं—नव-निर्माण है।


    3) Vlog-Feeling: कैमरा ऑन हो या ना हो—यात्रा रिकॉर्ड हो जाती है

    आजकल लोग पूछते हैं: “भाई, vlog बनाया?”
    मैं कहता हूँ: “हाँ… पर कैमरे में नहीं। दिल में।”

    क्योंकि कुछ सीन ऐसे होते हैं जो रिकॉर्डिंग में नहीं, अनुभव में कैद होते हैं—

    • मंदिर के सामने हाथ जोड़ते ही अचानक आँखें नम होना
    • घंटी की आवाज़ में पुराने दुखों का पिघलना
    • आरती के धुएँ में मन का हल्का होना
    • और “ॐ नमः शिवाय” बोलते हुए भीतर की आवाज़ का शांत होना

    Bhakti Yatra में हर मंदिर एक “स्टॉप” नहीं होता।
    वो एक स्टेशन होता है—जहाँ आपकी थकान उतरती है, और विश्वास चढ़ता है।


    4) पहला पड़ाव: खडकेश्वर महादेव — “शुरुआत वहीं से, जहाँ भरोसा मिलता है”

    राइड आगे बढ़ती है।
    शहर जाग चुका है।
    कहीं ट्रैफिक का शोर, कहीं स्कूल की बसें, कहीं दुकानों के शटर…

    और फिर आप पहुँचते हैं: खडकेश्वर महादेव
    (Keyword: “Shri Khadkeshwar Mahadev Mandir, Khadkeshwar”)

    कुछ जगहों पर शांति “साइलेंस” में नहीं, ऊर्जा में होती है।
    खडकेश्वर में वही ऊर्जा मिलती है।
    यहाँ खड़े होकर लगता है—
    “हाँ… आज का दिन ठीक रहेगा।”

    मंदिर के बाहर लोग आते-जाते हैं। कोई जल्दी में है, कोई इत्मीनान से।
    लेकिन शिवलिंग के सामने खड़े होकर सबको एक जैसा महसूस होता है:
    “मैं छोटा हूँ… पर मेरा भरोसा बड़ा है।”


    5) दूसरा अनुभव: भोलेश्वर — “जहाँ नाम ही जवाब है”

    Old City की गलियाँ—कभी-कभी उलझन जैसी लगती हैं।
    पर उसी उलझन में एक अपनापन भी है।
    आप आगे बढ़ते हैं: Gulmandi/Shahgunj belt की ओर।

    (Keyword: “Bholeshwar Mandir Gulmandi Shahgunj”)

    “भोलेश्वर”—नाम सुनते ही लगता है जैसे कोई कह रहा हो:
    “ज्यादा सोच मत… बस सौंप दे।”

    यहाँ आते ही समझ आता है कि शिव-भक्ति में भव्यता नहीं, भाव सबसे बड़ा है।
    आपको अपनी जिंदगी की पूरी कहानी बताने की जरूरत नहीं पड़ती।
    एक लाइन ही काफी होती है:
    “महादेव… बस रास्ता दिखा देना।”


    6) Chelipura का शिव-बेल्ट: माळीवाडा महादेव + हरेहरेश्वर — “रूट नहीं, रिदम बन जाता है”

    कई बार यात्रा का असली मजा “दो जगहों के बीच” होता है।
    Chelipura की तरफ जाते हुए, आप महसूस करते हैं कि शहर की धड़कन बदल रही है।
    लोगों की बोली, दुकानें, पुरानी इमारतें, और मंदिरों की श्रृंखला—सब मिलकर एक अलग रिदम बनाते हैं।

    • (Keyword: “Maliwada Mahadev Mandir Chelipura”)
    • (Keyword: “Harehareshwar Mahadev Temple Chelipura”)

    यहाँ एक चीज़ बहुत साफ दिखती है:
    भक्ति का सबसे सुंदर रूप “नियमितता” है।
    आप रोज़ थोड़ी देर भी महादेव के लिए निकालते हैं, तो मन खुद-ब-खुद मजबूत होता है।


    7) Roshan Gate: जगतईश्वर — “जहाँ भीड़ में भी शांति मिलती है”

    Old City का एक बड़ा सच यह है: यहाँ भीड़ है, आवाज़ें हैं, तेज़ी है…
    पर उसी के बीच कुछ मंदिर ऐसे हैं जहाँ पहुँचते ही दिल “धीमा” हो जाता है।

    (Keyword: “Jagateshwar Mahadev Mandir Roshan Gate”)

    जगतईश्वर के सामने खड़े होकर आपको एहसास होता है:
    दुनिया चाहे जितनी शोर करे, भीतर का मंदिर शांत हो सकता है।
    बस एक “दर” चाहिए—जहाँ आप खुद से मिल सकें।


    8) Adalat Road belt: “शिव… और शहर की रफ्तार”

    (Keyword: “Girishneshwar Temple Adalat Road”)

    यहाँ आते-आते दिन थोड़ा आगे बढ़ चुका होता है।
    शहर अपनी रफ्तार में है।
    और आप… अपनी रफ्तार छोड़कर एक अलग गति पकड़ चुके हैं।

    यही तो Bhakti Yatra का जादू है—
    आप जिंदगी की दौड़ से बाहर निकलते नहीं…
    बस दौड़ को समझना सीख जाते हैं।


    9) MGM / Indira Nagar: नागनाथ पाताळेश्वर — “गहराई का अनुभव”

    (Keyword: “Nagnath Pataleshwar Mandir MGM”)

    “पाताळेश्वर”—नाम ही बताता है: गहराई
    कभी-कभी समस्या बड़ी नहीं होती, हमारी सोच उथली होती है।
    और जब सोच गहरी होती है, समस्या छोटी हो जाती है।

    यह मंदिर आपको याद दिलाता है:
    हर सवाल का जवाब बाहर नहीं, भीतर होता है।
    बस थोड़ी गहराई चाहिए।


    10) New Usmanpura: दशमेश्वर — “आगे बढ़ना भी भक्ति है”

    (Keyword: “Dashmeshwar Shiv Mahadev Mandir New Usmanpura”)

    यहाँ एक बात दिल को छूती है:
    भक्ति का मतलब “रुकना” नहीं, आगे बढ़ना भी है।
    शिव स्थिर हैं… पर उनकी शक्ति हमें आगे बढ़ाती है।


    11) Jalna Road side: जुन्नेश्वर — “जप का असर”

    (Keyword: “Junneshwar Mahadev Mandir Jalna Road”)

    कई लोग पूछते हैं: “जप से क्या होता है?”
    जप से मन की रफ्तार कम होती है।
    और जब रफ्तार कम होती है, मन सही दिशा पकड़ लेता है।

    यहाँ बैठकर 5 मिनट भी अगर आप “ॐ नमः शिवाय” बोल लें—
    तो सच में लगता है, जैसे भीतर कोई “क्लियरेंस” हो गया।


    12) आखिरी पड़ाव: जनेश्वर — “यात्रा खत्म, पर शुरुआत यहीं से”

    (Keyword: “Janeshwar Mahadev Mandir Sambhajinagar”)

    यात्रा समाप्त होती है…
    पर मन के भीतर एक नई शुरुआत होती है।
    आप लौट रहे होते हैं, पर मन कह रहा होता है:
    “अब मैं संभल गया हूँ।”

    और यही Bhakti Yatra का असली परिणाम है—
    आत्मविश्वास की वापसी।


    13) 2–3 km City Loop (Suggested Darshan Route)

    अगर आप अपनी यात्रा आसान रखना चाहें:

    Start: City Chowk / Town Hall
    Gulmandi/Shahgunj
    Chelipura
    Roshan Gate
    Khadkeshwar
    Adalat Road
    MGM/Indira Nagar
    New UsmanpuraBack

    📌 Tip: सुबह जल्दी या शाम—भीड़ कम, अनुभव ज्यादा।


    14) महाशिवरात्रि पर इस यात्रा को “Special” कैसे बनाएं?

    महाशिवरात्रि में अगर आप Bhakti Yatra करें, तो 3 चीज़ें जरूर जोड़ें:

    (A) रुद्राभिषेक (सबसे श्रेष्ठ सेवा)

    जल/दूध/पंचामृत + “ॐ नमः शिवाय”
    ➡️ बाधा-निवारण, शांति, सफलता

    (B) महामृत्युंजय मंत्र जप

    108/1008
    ➡️ आरोग्य, भय-नाश, संकट-रक्षा

    (C) बेलपत्र अर्पण

    बेलपत्र + 108 बार “ॐ नमः शिवाय”
    ➡️ मनोकामना पूर्ति, पुण्य-वृद्धि

    और साथ में—दान-सेवा (अन्न/जल/वस्त्र)
    क्योंकि शिव-भक्ति का सबसे सुंदर रूप है: करुणा


    15) असली मोटिवेशन: “महादेव हमें बदलते नहीं, हमें हमारे ‘असल’ में लौटाते हैं”

    यह यात्रा आपको “नई जिंदगी” नहीं देती।
    यह यात्रा आपको आपकी असल जिंदगी वापस देती है—
    जिसमें आप मजबूत होते हैं, शांत होते हैं, और सही निर्णय लेते हैं।

    महादेव हमें एक सीधी बात सिखाते हैं:
    कर्म करो, चिंता छोड़ो।
    और जो आपका है, वो आपको मिलकर रहेगा।


    16) आपकी बारी: कमेंट में लिखिए

    🔱 आपका Old City में सबसे पसंदीदा महादेव मंदिर कौन-सा है?
    🔱 आपकी जिंदगी में “महादेव” ने आपको कब संभाला?

    मैं आपके कमेंट्स से अगली पोस्ट बनाऊँगा:
    “Bhakti Yatra Route – Followers Special (Best Suggestions)” 🙏

    हर हर महादेव! 🔱 | ॐ नमः शिवाय

  • Different things about Chatrapati Shivaji Maharaj

    छत्रपती शिवाजी महाराज म्हणजे फक्त तीनच राजकिय गोष्टी सांगितल्या जातात….!
    1.अफजलखानाचा कोथळा
    2.शाईस्तेखानाची बोटे
    3.आग्राहून सुटका


    पण मला भावलेले छत्रपती शिवाजी महाराज अनेक अंगाने समजून घ्यावे वाटतात….!


    1.आपल्या आईला सती जाण्यापासून रोखणारे छत्रपती शिवाजी महाराज “सामाजिक क्रांती” करणारे होते…!
    2.रयतेच्या भाजीच्या देठालासुद्धा हात लावता कामा नये हा आदेश देणारे “लोकपालक” राजे होते…!
    3.सर्व प्रथम हातात तलवारीबरोबरच पट्टी घेऊन जमीन मोजून तिची नोंद त्यांनी ठेवायला चालू केली असे “उत्तम प्रशासक” होते…!
    4.विनाकारण व विना मोबदला झाडं तोडल्यास नवीन झाड लावून जगवण्याची शिक्षा देणारे “पर्यावरण रक्षक” होते…!
    5.समुद्र प्रवास करण्यास धर्म शास्त्रात बंदी होती. तो विरोध पत्करून आरमार उभे केले व आधुनिक नौदलाचा पाया रचून धर्मा पेक्षा देश मोठा हा संदेश देणारे “स्व-धर्मचिकित्सक” होते …!

    1. मुहूर्त न पाहता, अशुभ मानल्या गेलेल्या अमावस्येच्या रात्री सर्व लढाया करुन त्या सर्वच्या सर्व लढाया जिंकून ” अंधश्रध्दा निर्मुलनाचा संदेश देणारे चिकीत्सक राजे”
    2. ३५० वर्षांपूर्वी छत्रपती शिवरायांनी सुरु केलेली शिवकालीन पाणी साठवण व्यवस्था आजही तितकीच प्रभावी आहे ! “जलतज्ञ” राजे छत्रपती शिवराय!!
    3. ३५० वर्षांपूर्वी दळणवळणाचे कोणतेही साधन नसताना अभेद्य असे १०० राहून अधिक गडकिल्ल्यांचे निर्माते, “उत्तम अभियंते राजे”
    4. सर्व जातीधर्मातल्या मावळ्यांना समान न्याय देत सामाजिक क्रांतीचा पाया रचणारे राजे!!
    5. परस्त्री मातेसमान मानत महिलांना सन्मानाने वागवाणारे “मातृभक्त, नारीरक्षक” छत्रपती शिवराय

    खऱ्या अर्थाने ते “लोकराजे” होते कारण ते धर्म जातीच्या पलीकडे जाऊन सुखी जनतेचे स्वप्न पहात होते हीच खरी शिवशाही होती…..!

  • स्वामी विवेकानंद व जगातला पहीला अरबपति जाॅन डी राॅकफेलर….

    #एकसत्यघटना…. कदाचित तुम्ही कधीही ऐकली नसेल….

    स्वामी विवेकानंद व जगातला पहीला अरबपति जाॅन डी राॅकफेलर….

    जगात आज अनेक अरबपति असतील पण पहिल्यांदा हा शब्द ऐकायला मीळाला तो राॅकफेलर मुळे! प्रचंड श्रीमंत माणूस….. जगातील पहीला अरबपति!रात्रंदिवस एकच ध्येय फक्त पैसा. हा माणूस कुठेही फक्त पैसा शोधायचा याचे नातीगोती, मीत्र, सगेसोयरे फक्त पैसा 😌

    घटना अशी घडली 1893 साली वयाच्या 53 व्या वर्षी हा माणूस आजारी पडला… डोक्यावरचे सारे केस झडून गेले…. शरीर गळायला लागलं… तोंडात अन्न गीळेना थोडसं सुप पिऊन जगण्याची वेळ आली… त्याला झोपही लागत नव्हती ईतकच नाही तर त्याला हसता रडता देखील जमेना…. अमेरीकेतील सर्व नामवंत डाॅक्टरना दाखवून झाले पण उपयोग शुन्य..,.. डाॅक्टरनी शेवटी सांगितले आपण फक्त एक वर्षाचे मेहमान आहात…..

    त्याचवेळी स्वामी विवेकानंद शिकागो मध्ये होते.

    आणि राॅकफेलर च्या एका मीत्राने सहजच एक सल्ला दिला की हिंदुस्थानांतील एक सन्यासी ईथे आलाय आपण एकदा त्यांची भेट घ्यावी! राॅकफेलर सुरवातीला भडकला “असल्या गोष्टीवर मी विश्वास ठेवत नाही, तो सन्यासी काय करणाराय? ” म्हणून त्याने टाळले. पण काय कुणास ठाऊक दोन दिवसांनी तो भेटीला निघाला.

    स्वामी विवेकानंद हाॅटेलच्या रुममध्ये काहीतरी लिखाण करण्यात व्यस्त होते… राॅकफेलर जाउन थांबले राॅकफेलरला अपेक्षा होती मी एवढा माणूस माझ्यासाठी मोठं आदरातिथ्य होईल पण विवेकानंदानी ढुंकूनही पाहिलं नाही! शेवटी राॅकफेलर म्हणाला मी उद्योजक राॅकफेलर….
    स्वामी म्हणाले, “बरं…मग”
    “मला पाहुन ईथला राष्ट्राध्यक्ष सुद्धा उभा राहतो”-ईति राॅकफेलर
    ” असं आपलं काम सांगा”स्वामी विवेकानंद
    शेवटी स्वामीजींनी बोलायला सुरुवात केली.
    “तुम्ही मनाने फार बैचैन आहात” आणि मग त्याच्या जीवनातील अशा काही घटना सांगीतल्या की, ज्या त्याच्याशिवाय कुणाला माहिती नव्हत्या! तो ही परेशान झाला! एक तासांच्या चर्चेनंतर स्वामी विवेकानंदानी त्याना सांगीतलं की यावर एकच पर्याय आहे तुम्ही दानधर्म केला पाहिजे.

    राॅकफेलरवर स्वामींचा एवढा प्रभाव पढला की त्याने एक फाउंडेशन काढलं त्यातुनच पुढे मलेरिया, टीबी, यारख्या अनेक रोगावर औषध बनवून मुफ्त मध्ये ईलाज झाले तो जगातील सर्वात मोठा डोनर झाला…..
    पुढे??? आश्चर्य हे झाले ज्याला एक वर्षाची मुदत डॉ. नी सांगितली होती तो #राॅकफेलर 98 वर्षे जगला तोही आनंदात…

    आज जो जगातील सर्वात मोठा डोनर आहे बील गेट्स तो त्याच्या पुस्तकात लिहतो मला डोनेशन ची प्रेरणा राॅकफेलर फाउंडेशन मुळे मीळाली!

    मीत्रानो ही आहे एका हिंदू सन्याशाची व हिंदू तत्त्वज्ञानाची किमया आणि आम्ही मात्र आज त्यांच्याकडे तिरस्काराने पाहतो, आपली ताकद ओळखा!
    आणि भौतिक सुखाच्या मागे लागुन पैसा हे सर्वस्व आहे हे समजु नका वेळ आली ना तो हि कामाचा नाही!
    आणि तीसरं द्यायला शिका…. द्याल तरच मीळत जाईल हेच हिंदू तत्त्वज्ञान आहे साठवाल तर सडायला सुरवात होईल!

    उमाकांत नामदेव माने
    माऊली प्रतिष्टाण उमरगा

  • औरंगाबाद विषयी महत्वपूर्ण माहिती

    🌹ऐतिहासिक औरंगाबाद विषयी महत्वपूर्ण माहिती जपून ठेवा नंतर माहिती मिळता मिळत नाही हे लक्षात ठेवा 🌹

    शहराची एकुण ९ नावे –
    पैठणच्या सातवाहन, चालुक्य, विक्रमादित्याच्या काळात राजतडाग या महाकाय तलावाच्या काठावर वसलेले अश्मकपद, अश्शकपद या नावाने ओळखले जाणारे हे गाव यादवांच्या ताब्यात गेले तेव्हा कटक, कटकी या नावाने ओळखले जाऊ लागले. कटक म्हणजे गड. पूर्वी देवगिरी गडाच्या आधाराने पसरलेली यादवांची राजधानी छावणी भागापर्यंत होती आणि ती कटकी म्हणून ओळखली जात होती. मलिक अंबर आला तेव्हा त्याच्या उच्चारानुसार ती खडकी झाली. तो जोपर्यंत जिवंत होता तोपर्यंत मोघलांना दक्षिणेत पाय रोवताच आलेले नव्हते. एकदा मोघल फौजांनी हे शहर एवढे बेचिराख केले की ते तीन दिवस जळतच होते. आता पुन्हा हे शहर वसणार नाही अशा खात्रीने जहांगिरनामात करकी तीन दिवस जळत राहिल्याचा उल्लेख केलेला आहे. खडकीचा उल्लेख करकी असा केला कारण मोघलांच्या उच्चारात ख आणि ड उच्चारासाठी अक्षरच नाही. त्याऐवजी क आणि र वापरले जात. त्यानंतरही मलिक अंबरने पुन्हा हे खडकी शहर उभे केले. पण मलिक अंबर मरण पावल्यानंतर त्याच्या मुलाने फतेखानाने शहराचे नाव फतेहाबाद ठेवले. मलिक अंबर १६२४ साली मरण पावला. त्यानंतर औरंगजेबाने फतेखानाचा पराभव करीत खडकी जिंकले तेव्हा पहिल्यांदा शहाजहान याने औरंगजेबाला पत्र लिहिले. त्यात त्याने पहिल्यांदा या शहराचा उल्लेख औरंगजेबाने जिंकले या अर्थाने औरंगाबाद असा केलेला आहे असा संदर्भ यदुनाथ सरकार यांच्या ‘हिस्ट्री ऑफ औरंगाबाद’ या पुस्तकात आहे. प्रत्यक्ष औरंगजेब मात्र या शहराचा उल्लेख खुजिस्ता बुनियाद (श्रेष्ठतेचा पाया) असा करायचा. आज या शहराला लोकभावनेनुसार संभाजीनगर असे म्हटले जाते. अश्मकपद ते संभाजीनगर अशी या शहराची गेल्या हजार वर्षात तब्बल ९ वेळा नामांतरे झालेली आहेत.

    चार मकबरे : बीबी का मकबरा, रोजा पीर इस्माईल मकबरा, काला मकबरा, विद्यापीठ, कासीम बर्री मकबरा.

    पानचक्की : बाबाशहा मुसाफीर यांनी बांधलेले गुरुकुल.

    लेणी : एकूण ३ टप्प्यात १२ लेण्या आहेत.

    शहरात ४ किल्ले : मूळ शहर हे भुईकोट किल्लाच होते. त्याला १३ दरवाजे आहेत. किले अर्क, किले बायजीपुरा, किले बेगमपुरा.

    शहरातील महल : गुलशन महल, नौखंडा पॅलेस, सब्ज महल, किलेअर्कमधील मर्दाना आणि जनाना महल, रोशन आरा महल (हर्सुल), दमडी महल, बायजीमहल, सोनेरी महल.

    हवेल्या : चिमणाराजाची, राजा जयसिंगाची (छत्रपती शिवाजी महाराजांनी मुक्काम केलेली), कुक्कुलाल हवेली.

    देवड्या : रामदास देवडी, दिवाण देवडी, लाल देवडी, बख्तावरमल देवडी, मन्सूर यारजंग देवडी, महाराजा किसनप्रसाद देवडी,

    चार सराय (धर्मशाळा) : जुनाखान सराय (जुनाबाजार), हर्सूल सराय (हर्सूल जेल), सराय महेबुबजान (फाजलपुरा), जोहराजान सराय (रंगारगल्ली)

    वाडे : काजीवाडा, काचीवाडा, भोई वाडा, कुंभारवाडा, हमाल वाडा, नाईकवाडा, कवटीचा वाडा, माळीवाडा, कसाब वाडा, मोची वाडा,

    वाडी : वैतागवाडी, शहानूरवाडी, गोकुळवाडी, नक्षत्रवाडी, जाधव वाडी, नागेश्वर वाडी,

    ५२ पुरे : कुतुबपुरा, रणमस्तपुरा, गोधडीपुरा, उस्मानपुरा, औरंगपुरा, बायजीपुरा, हत्तीसिंगपुरा, खारिकपुरा, पेन्शनपुरा, जयसिंगपुरा, बेगमपुरा, मालजीपुरा, कोतवालपुरा, कर्णपुरा, रोशनपुरा, कबाडीपुरा, जसवंतपुरा, नवाबपुरा, बहादुरपुरा, रशिदपुरा, गवळीपुरा, ढोरपुरा, मंजूरपुरा, फत्तेसिंगपुरा, महमुदपुरा, मुघलपुरा, फाजलपुरा, मोमीनपुरा, भावसिंगपुरा, पहाडसिंगपुरा, रंभापुरा, खोकडपुरा, रेंगटीपुरा, भीमपुरा, शांतीपुरा, चेलीपुरा, रोहिदासपुरा, केशरसिंगपुरा, रसुलपुरा, कासमपुरा, पद्मपुरा, परसोजीपुरा, खेलोजीपुरा, वि’ोजीपुरा, किराडपुरा, सुलतानपुरा, कैकाडीपुरा, साखनपुरा, चौसरपुरा, शुभकर्णपुरा, लोधीपुरा (राजू मोतीराम पवार यांच्या खासगी संग्रहातून ही ५२ पुऱ्यांची नावे घेतली आहेत. प्रत्यक्षात आणखी नावे उपलब्ध आहेत)

    दरवाजे : भडकल, छोटा भडकल, खिजर (हाथी किंवा खुस्त्रो), खुनी (इक्बाल), खास (जालना), दिल्ली, काळा, नौबत (किलेअर्क), कटकट (इस्लाम), रोशन, जफर, पैठण, बारापुल्ला, मक्का (मकाई), कुंभारवाडा, महेमुद, रंगीन, मर्दाना (माबुल दाखला), चौगान, रंगीन, नूर (बुलंद), बेगम, खिडकी, चावल, लाल, मुघल, दगड, खिडकी, शहापुर, मीर आदिलअली, सलाम, मोहरमबारी, शाह, दारूदुकानदरवाजा, तलाबेकलाम, मादा, खादगार, इस्माईल, दौलत, दालमंडी, किला बेगमपुरा, किला बायजीपुरा,

    नहर : नहर ए अंबरी, नहर ए पळशी, नहर ए नसरुल्ला, नहर ए पानचक्की, नहर ए किराडपुरा, नहर ए गारखेडा, नहर ए कोटला, नहर ए बेगमपुरा (थत्ते नहर), नहर ए शाहअली, नहर ए चौसर, नहर ए शहानूर, नहर ए छावणी

    सहा चबुतरे : हाथी चबुतरा किलेअर्वâ, चांदणी चबुतरा हिलाल कॉलनी, काला चबुतरा क्रांती चौक, घोडेस्वारांचा चबुतरा आमखास मैदान, सिद्धिअली चबुतरा, हरदौल चबुतरा, चोट्टा चबुतरा.

    शहरातील उद्याने : (महम्मदी) हिमायत बाग, रोशनआरा बाग, अब्देअली बाग, लाला मन्साराम बाग, बाग शेर जंग, चौसर बाग, शतरंज बाग, आसेफ बाग, बसंत बाग, अंगुरी बाग, बरखी बेगम बाग, बाग ए संपत, खाला अम्मा का बाग, हरकारे का बाग, रहिम बाग, मोहम्मद मानखा बाग, अफलातून बाग, शिकार बाग, बागे जैबुन्निसा, रोजा बाग, राजा जयसिंग बाग, बेगम बाग, आजम बाग, अहेमद बाग, हिमायत बाग, सुपारी बाग, सिताफली बाग, अमरुद बाग, आटोळा बाग, जोहरी बाग.
    कार्यालये : अमीन कचेरी, सुभेदारी,

    टॉवर किंवा घड्याळे : शहागंज आणि गुलमंडी

    टेकड्या : जोबन टेकडी, हनुमान टेकडी, गोगापीर टेकडी, चमार टेकडी. मजनुहिल टेकडी

    चार गंज : शहागंज, सुलतान गंज, राम गंज, आजम गंज.

    बाजार : जुना बाजार, केळी बाजार, राजा बाजार, शहा बाजार, मुलमची बाजार, शाह बाजार, चुडी बाजार, कासारी बाजार

    मंडी : गुलमंडी, घासमंडी, सब्जीमंडी, लालमंडी, लक्कडमंडी

    कारंजे : मोती कारंजा, लोटा कारंजा,

    छत्र्या : छावणीतील छत्री, हर्सूलमधील छत्री, राजा जयसिंग छत्री

    चावड्या : किराणा चावडी, लक्ष्मण चावडी, जयसिंग चावडी, नाई की चावडी.

    तकीये : बडा, छोटा

    पुराणवस्तुसंग्रहालये : सोनेरी महल, मातोश्री पुरवार, छत्रपती शिवाजी पुराणवस्तू, विद्यापीठातील, बीबी का मकबऱ्यातील, पानचक्कीतील, देवगिरी किल्ल्यातील. (वैयक्तिक संग्रह : बाळासाहेब पाटील, पैठण, हिरुभाऊ जगताप, अब्दुल हई)
    (संग्रहित माहिती)

  • भारतीय स्वातंत्र्यदिवस – Happy 75th Indepence Day 2021

    🇮🇳🇮🇳भारतीय स्वातंत्र्यदिवस🇮🇳🇮🇳

    भारतीय स्वातंत्र्यदिवस प्रतिवर्षी १५ ऑगस्ट रोजी साजरा केला जातो. ब्रिटिश साम्राज्यापासूनदिनांक १५ ऑगस्ट इ.स. १९४७ रोजी भारताला स्वातंत्र्य मिळाले. त्याच्या गौरवार्थ हा दिवस स्वातंत्र्यदिवस म्हणून देशभरात साजरा केला जातो. हा भारतातील एक राष्ट्रीय सण आहे. या दिवशी दिल्लीतील लाल किल्ल्यावरून ध्वजारोहण केले जाते. तसेच देशभरात अनेक ठिकाणी ध्वजारोहण, मिरणूवका व सांस्कृतिक कार्यक्रमांद्वारे हा दिवस साजरा केला जातो.

    🇮🇳 इतिहास🇮🇳

    १७७० पासून भारतावर इंग्रजांचे राज्य होते. १८ व्या शतकापासूनच सर्व राजांना इंग्रजान्ने आपल्या सैन्याच्या मदतीने ताब्यात ठेवले होते. १८५७ च्या स्वातंत्र्यसमारानंतर ब्रिटिशांनी त्यांची व्यवस्था अजूनच शिस्तीची केली.१८८५ साली भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ची स्थापना झाली. २० व्या शतकातमोहनदास करमचंद गांधी ह्यांनी अहिंसा बाळगतचले जाओ आंदोलन व अशी अनेक आंदोलने केली.महात्मा गांधींनी सविनय कायदेभंग चळवळीचे नेतृत्व केले. १९२९ साली लाहोर च्या सत्रात काँग्रेस ने संपूर्ण स्वराज्य ची घोषणा केली. त्यावेळी त्यांनी २६ जानेवारी हि तारीख भारताचा स्वातंत्र्यदिवस म्हणून घोषणा करायची योजना केली. १९३० साली काँग्रेस ने निवडणुका जिंकल्या. त्यानंतर संपूर्ण स्वराज्य साठी सर्व नेत्यांनी असहकार आंदोलन केले. १९४० साली मुस्लिम कार्यकर्ते हे हिंदूंपासून वेगळे झाले व त्यांनीऑल इंडिया मुस्लिम लीग ची स्थापना केली. दुसऱ्या महायुद्ध नंतर ब्रिटिशांना लक्षात आले कि आपल्याला भारतावरचे राज्य व युद्ध हे सांभाळता येणार नाही आहे. तसेच दुसऱ्या बाजूला भारतीय क्रांतिकार्यांचा जोर वाढत होता. हि गोष्ट कळल्यानंतर ब्रिटन च्या प्रधानमंत्र्यांनी जून १९४८ पर्यंत भारत पूर्णपणे स्वतंत्र करण्याची हमी दिली.अखेर दिनांक १५ ऑगस्ट १९४७ रोजीभारत स्वतंत्र झाला. पण जाताजाता त्यांनी भारतावर अजून एक घाव घालत भारताचेपाकिस्तान आणि भारत असे दोन तुकडे पाडले. पाकिस्तानी भागात राहणाऱ्या अनेक शिखमाणसांना त्यांचे घरदार,पैसा सोडून यावे लागले. अनेक लोक ह्यामध्ये मारलेही गेले. पुढे ह्या विभाजनामुळे काश्मीर चा प्रश्न हि पुढे आला.

    🇮🇳 स्वतंत्र भारत🇮🇳

    स्वतंत्र भारत २६ जानेवारी १९५० रोजी प्रजासत्ताक झाला. भारताचे संविधान तयार करण्यात बाबासाहेब आंबेडकर ह्यांचा मोलाचा वाट होता. स्वतंत्र भारताचे पहिले पंतप्रधान पंडित जवाहरलाल नेहरू , पहिले राष्ट्रपती राजेंद्र प्रसादहोते. रवींद्रनाथ टागोर ह्यांनी लिहिलेले जन गण मन हे भारताचे राष्ट्रगीत तर बंकिमचंद्र चट्टोपाध्यायह्यांनी लिहिलेले वन्दे मातरम हे राष्ट्रीय गीत म्हणून संबोधण्यात आले.

    🇮🇳स्वातंत्र्यदिवासाचा उत्सव🇮🇳

    भारतात सर्व ठिकाणी स्वातंत्र्य दिवसाची सुट्टी दिली जाते. सर्व गृहराचानांमध्ये,शाळांमध्ये,महाविद्यालये-कार्यालयांमध्ये ध्वजारोहण व ध्वजवंदन असते. राजधानी दिल्ली मध्ये राजपथावर सैन्यदले परेड करतात. त्यादिवशी बहुतांश रेडीओ चैनल तसेच दूरदर्शन वर देशभक्ती विषयी गाणी,कार्यक्रम,चित्रपट लागतात.
    ======================🇮🇳
    श्रीधर कुलकर्णी

  • लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक

    23 जुलै 1856 साली रत्नागिरी शहरात जन्मलेले लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक हे एक जहालमतवादी स्वातंत्र्यसैनिक, राजकारणी आणि पक्के पत्रकार आणि अभ्यासू लेखक होते.
    त्यांना लोकांनी लोकमान्य ही उपाधी दिली आहे ती त्यांच्या प्रेमापोटी आणि विश्वासापोटी.
    लोकमान्य हे शाळकरी जीवनापासून परखड विचारांचे आणि स्पष्टवक्ते म्हणून ओळखले जातात, “मी शेंगा खाल्या नाही मी टरफले उचलणार नाही” जे त्यांचे शाळेतले वाक्य खूपच प्रसिद्ध आहे ते त्याचच उदाहरण होय.


    एका मध्यमवयीन कुटुंबातील लोकमान्य यांचे मूळ गाव तसे दापोली तालुक्यातील चिखलगाव, परंतु वडिलांना कामामुळे रत्नागिरीस यावे लागले आणि म्हणून सर्व लोकमान्य टिळकांना रत्नागिरीचे म्हणून ओळखतात.

    शैक्षणिक वाटचाल


    लोकमान्य टिळक आणि आगरकर यांची घनिष्ठ मैत्री होती त्यांनी विष्णु शास्त्री चिपळूणकरांना सोबत घेऊन त्याकाळी म्हणजे 1880 साली पुण्यात न्यू इंग्लिश स्कुलची स्थापना केली, पुढे 1884 केळकर, दांडेकर, भांडारकर आदी मंडळींना एकत्र आणून डेक्कन एज्युकेशन सोसायटीची मुहुर्तमेढ रोवून त्या अंतर्गत 1885 साली आज पुण्यातील नामांकित फर्ग्युसन कॉलेजची स्थापना केली.


    असे हे थोर टिळक स्वतः गणित व संस्कृत हे विषय आवडीने आई उत्तम शिकवित असत.
    टिळक व आगरकर यांनी मिळून केसरी व मराठा हे दोन नियतकालिके सुरू केली.


    केसरी मराठीत आणि मराठा हे इंग्रजीत छापल्या जात होते.
    टिळकांचे अग्रलेख हा केसरीचा खरा आत्मा होता, पुण्यात प्लेगच्या साथीच्या वेळी फवारणी वरून ब्रिटिश सरकारने फवारणीच्या नावांखाली घरातील सामान बाहेर फेकून नासधूस केली तेव्हा  “सरकारचे डोके ठिकाणावर आहे काय” असा निखारा पेटवणारा अग्रलेख टिळकांनी लिहिला जो आजही सर्वांच्या लक्ष्यात आहे.


    नंतर काही कारणाने आगरकर आणि टिळकांचे काही मुद्यांवर वाद झाले.
    टिळकांनी लोकांना ब्रिटिशांविरुद्ध लोकांनी एकत्र येण्यासाठी सार्वजनिक गणेशोत्सव आणि आणि शिवजयंती उत्सवाची सुरुवात केली जी भारतीय स्वातंत्र्यलढ्यात खूप प्रभावशाली ठरली.
    या लढ्यात त्यांना ब्रिटिशांनी 6 वर्षे मंडालेच्या तुरुंगात कारावास दिला ते येरवाड्यात सुद्धा कारावासात होते.
    टिळकांनी लेखक म्हणून गीता रहस्य, ओरायन सारखे छान ग्रंथब सुद्धा लिहिले.


    प्लेगच्या साथीत त्यांनी आपला पुत्र, चुलतभाउ आणि भाच्याला गमावले होते.


    असे हे लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक 1920 साली 1 ऑगस्ट रोजी या जगाचा निरोप घेऊन इहलोकी गेले त्यांच्या पुण्यतिथी निमित्त त्यांना ही शब्दरूपी आदरांजली…

    लोकमान्य टिळक
  • औरंगाबाद आणि पुरे

    अनोखा वारसा पुरांचा -औरंगाबाद

    औरंगाबाद शहराला फार मोठा ऐतीहसिक वारसा लाभलेला आहे. तो आज जरी दुर्लक्षित असला तरीही त्यांची मुळे आजूनही शहरात घट्ट रोवलेली दिसतात.
    औरंगजेब याने खडकी नामक या शहराला औरंगाबाद असे नाव दिले.

    औरंगाबाद आणि पुरे - Aurangabad

    एकूण ५२ दरवाज्यांचे शहर म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या औरंगाबाद शहराचे आणखी एक वैशिष्टय म्हणजे ह्या शहरात असलेले ५४ पेक्षा अधिक “पुरे”.
    औरंगजेब याच्या सरदारांच्या छावण्या ज्या ठिकाणी पडत गेल्या त्या त्या भागांना “ पुरा “ असे संबोधल्या गेले.


    औरंगाबाद बस स्थानकापासून रेल्वे स्थानकाकडे जात असतांना त्यापैकी कर्णपुरा आणि पदमपुरा हे दोन पुरे लागतात. बिकानेर येथील राजा करणसिंह याची वस्ती कर्णपुरा भागात, तर त्याचा पुत्र पदमसिंह याची वस्ती पदमपुरा येथे होती.


    करणसिंह ह्याचा दुसरा मुलगा केशरसिंह याची वस्ती ज्या भागात होती त्यास केशरसिंहपुरा असे म्हणत. आजहि बाबा पेट्रोल पंपावरून क्रांती चौकाकडे जात असतांना केशरसिंहपुऱ्याचे अस्तित्व आपल्याला जाणविते.
    त्याच प्रमाणे जयसिंगपुरा हा जोधपुरच्या मिर्झाराजे जयसिंग यांचा जयसिंगपुरा म्हणजे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विद्यापीठाच्या प्रवेशद्वारासामोरील भाग.


    राजा अमरसिंगाचा मुलगा रावराजसिंग यांची वस्ती म्हणजे रावसपुरा.
    बुन्देलखंडातील ओरछाचा राजा पहाडसिंग यांच्या वस्तीला पहाडसिंगपुरा म्हंटले जाते, पहाडसिंगपुरा म्हणजे बेगमपुरा आणि औरंगाबाद लेण्यांच्या मधला परिसर.
    पहाडसिंग यानेच विद्यापीठ परिसरातील सोनेरी महाल बांधला. त्याचेच नातेवाईक रणमस्तखानचा रणमस्तपुरा तर कुतुबुद्दीनचा कुतुबपुरा यांचे अस्तित्व आजही औरंगाबाद शहरात जाणवते.


    शहाजीराजे यांचे चुलत भाऊ मालोजी आणि परसोजी यांच्या नावावरून मालोजीपुरा आणि परासोजीपुरा या दोन वस्त्या निर्माण झाल्या.
    अशा प्रकारे निर्माण झालेल्या वस्त्या म्हणजे आजचे औरंगाबाद शहरातील ” पुरे “.


    इतिहासातील दास्तऐवजानुसार व माहितीतले असे एकूण ५६ पुऱ्यांची नावे मला सापडली.

    ते पुरे खालील प्रमाणे. यातील बरिच ठिकाणे आजही आपले अस्तित्व टिकवून आहेत, तर काही वसाहती नामशेष झालेल्या आहेत.

    (१) बेगमपुरा (२) औरंगपुरा (३) मुकामपुरा (४) फाजलपुरा (५) अहिरपुरा (६) दावद्पुरा (७) नवाबपुरा (८) बायजीपुरा (९) दरवेशपुरा (१०) नक्षपुरा (११) कुतुबपुरा (१२) जसुपुरा (१३) सुलतानपुरा (१४) कर्णपुरा (१५) चेलीपुरा (१६) सबकर्णपुरा (१७) इस्माइलपुरा (१८) तानाजीपुरा (१९) पदमपुरा (२०) लासगोपालपुरा (२१) मंजुरपुरा (२२) हैसिंगपुरा (२३) परतबपुरा (२४) पहाडसिंगपुरा (२५) जमालपुरा (२६) मानसिंगपुरा (२७) जयसिंगपुरा (२८) जसवंतसिंगपुरा (२९) भावसिंगपुरा (३०) जयचंदपुरा (३१) जासुद्पुरा (३२) रणमस्तपुरा (३३) पैदापुरा (३४) हमीलपुरा (३५) धोतीपुरा (३६) कलहालपुरा (३७) परासोजीपुरा (३८) तबीबपुरा (३९) रावसपुरा (४०) चाकरपुरा (४१) कोतवालपुरा (४२) लालवंतपुरा (४३) असदपुरा (४४) रामपुरा (४५) रेंगटीपुरा (४६) केशरसिंगपुरा (४७) बलोचपुरा (४८) राम्बापुरा (४९) खोकडपुरा (५०) मालोजीपुरा (५१) उस्मानपुरा (५२) कागजीपुरा (५३) काबाडीपुरा (५४) किराडपुरा (५५) महमूदपुरा आणि (५६) रशीद्पुरा

    आणखी आपल्या माहितीत असेल तर कमेंटमध्ये कळवा

  • भारताची बिअर राजधानी – औरंगाबाद.


    पाण्यातच नशा आहे!

    औरंगाबादची एक प्रसिद्धी भारताची बिअर राजधानी अशी सुद्धा आहे. किंगफिशर, फाॅस्टर'स, कार्लसबर्ग, हैनेकेन (नावातील चुकभूल माफ करावी), खजुराहो या प्रसिद्ध नाममुद्रांचा (मराठीत ब्रॅंडस्!) संबंध औरंगाबाद शहराशी आहे /होता.

    वाळूजच्या औद्योगिक पट्ट्यामध्ये या नाममुद्रांच्या ब्रुअरीज आहेत/होत्या. शहरातील ब्रुअरीज 180 दशलक्ष लिटर पेक्षा अधिक बियरचे दरवर्षी उत्पादन करतात. महाराष्ट्राच्या एकूण ब्रुईंग क्षमतेच्या 70 टक्के क्षमता ही औरंगाबादच्या ब्रुअरीजमध्ये आहे. या ब्रुअरीजना दररोज जवळपास ३५ दशलक्ष लिटर पाणी लागते. औरंगाबाद शहरात सोळा मोठ्या ब्रुअरीज आणि डिस्टीलरीज आहेत.

    एकीकडे औरंगाबादकरांना प्यायला पाणी नाही आणि इकडे मद्य उत्पादक औरंगाबादकडे धावतात याचे कारण हे आहे की जायकवाडी धरणातून त्यांना सिलिका विरहित पाणी मिळते. त्यामुळे बिअरला खास चव प्राप्त होते.

    महाराष्ट्रात मुंबई-पुणे-नाशिक आणि नागपूर ही चार मद्याचा वापर करणारी मोठी शहरे आहेत आणि त्यांना लागणारा बराचसा पुरवठा औरंगाबाद मधून होतो. अनेक मद्य उत्पादक कंपन्यांमध्ये नामवंत पुढाऱ्यांचे जवळचे नातेवाईक संचालक आहेत असेही वाचनात आले होते.

    डिस्टिलरीज मध्ये ज्वारी, गहू, बाजरी, मका, बटाटा, बार्ली इ.चाही वापर केला जातो. काही लोक हलत डुलत जातांना दिसले तर त्यांना दोष देऊ नका, ते सिलिका मुक्त पाणी पिऊन चाललेले असतील! ‌‌. . -

    मूळ लेखक : रवींद्र धोंगडे

    PC- Google.