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  • Bhakti Yatra: एक Spiritual Ride जो दिल की धड़कन को “शांत” और आत्मा को “मज़बूत” कर देती है

    Bhakti Yatra: एक Spiritual Ride जो दिल की धड़कन को “शांत” और आत्मा को “मज़बूत” कर देती है

    Bhakti Yatra: एक Spiritual Ride जो दिल की धड़कन को “शांत” और आत्मा को “मज़बूत” कर देती है

    (छत्रपती संभाजीनगर – Old City के पुराने महादेव मंदिरों की यात्रा)

    कुछ यात्राएँ रास्तों पर नहीं चलतीं… वे मन के भीतर चलती हैं।
    और कुछ राइड्स सिर्फ बाइक/स्कूटी की आवाज़ नहीं होतीं—वे जिंदगी की आवाज़ को धीमा कर देती हैं।

    आज की यह पोस्ट एक ऐसी ही यात्रा की कहानी है—Bhakti Yatra, एक Spiritual Ride, जिसमें हम छत्रपती संभाजीनगर (Aurangabad) के पुराने शहर (Old City) के भीतर और आसपास मौजूद पुराने/प्रसिद्ध महादेव मंदिरों की ओर निकलते हैं। यह कोई “टूर प्लान” नहीं—यह एक भावना है। एक अनुभव। एक रीसेट।

    कभी आपने महसूस किया है—भीड़ में रहते हुए भी मन अकेला हो जाता है?
    कभी आपने चाहा है कि बस 10 मिनट ऐसे मिल जाएँ जहाँ दिमाग की “हजार आवाज़ें” बंद हो जाएँ?
    कभी लगा है कि सब कुछ आपके कंट्रोल में होने के बाद भी भीतर कुछ टूट-सा रहा है?

    ऐसे ही किसी समय में, बिना ज्यादा सोचे, बस एक लाइन निकलती है—
    “महादेव… संभाल लेना।”
    और फिर… आप खुद को एक मंदिर के सामने खड़ा पाते हैं।


    1) Old City की सुबह: जब सड़कें भी “ॐ” बोलती हैं

    Old City की सुबह का अपना जादू है।
    गली के नुक्कड़ पर चाय की केतली की सीटी, कहीं दूर से आती मंदिर की घंटी, दुकानें खुलती हैं, लोग काम पर निकलते हैं… और इस सबके बीच, मन में एक अलग-सी शांति उतरने लगती है।

    आप हेलमेट ठीक करते हैं, बाइक स्टार्ट करते हैं, और खुद से कहते हैं—
    “आज नहीं भागना है… आज बस महसूस करना है।”

    यह वही शहर है जहाँ इतिहास सांस लेता है। जहाँ पुराने पत्थरों में भी कहानी होती है। और जहाँ शिवालय सिर्फ इमारत नहीं, आस्था का ठिकाना होते हैं।

    Bhakti Yatra की शुरुआत अक्सर किसी “तैयारी” से नहीं होती।
    यह शुरुआत होती है एक हल्के-से भाव से—
    “चलो… आज महादेव के पास।”


    2) इस यात्रा का मकसद: “मन” का मैकेनिक बनना

    हम रोज़ शरीर का ध्यान रखते हैं—खाना, पानी, नींद…
    पर मन?
    वो कहीं पीछे छूट जाता है—मीटिंग्स, पैसे, जिम्मेदारियाँ, टेंशन, तुलना… और एक दिन अचानक मन कह देता है:
    “बस… अब नहीं।”

    Bhakti Yatra वही जगह है जहाँ मन को मरम्मत की जरूरत नहीं पड़ती—वो खुद ही ठीक होने लगता है।
    क्यों?

    क्योंकि मंदिर में जाकर आपको कोई “परफेक्ट” बनने नहीं कहता।
    महादेव के सामने आप जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार हो जाते हैं।
    आपकी कमजोरी भी, आपकी ताकत भी।

    और एक बात…
    महादेव की सबसे बड़ी सीख है—
    जो टूटता है, वही तो फिर से बनता है।
    शिव “संहार” के देव हैं, लेकिन उनका संहार विनाश नहीं—नव-निर्माण है।


    3) Vlog-Feeling: कैमरा ऑन हो या ना हो—यात्रा रिकॉर्ड हो जाती है

    आजकल लोग पूछते हैं: “भाई, vlog बनाया?”
    मैं कहता हूँ: “हाँ… पर कैमरे में नहीं। दिल में।”

    क्योंकि कुछ सीन ऐसे होते हैं जो रिकॉर्डिंग में नहीं, अनुभव में कैद होते हैं—

    • मंदिर के सामने हाथ जोड़ते ही अचानक आँखें नम होना
    • घंटी की आवाज़ में पुराने दुखों का पिघलना
    • आरती के धुएँ में मन का हल्का होना
    • और “ॐ नमः शिवाय” बोलते हुए भीतर की आवाज़ का शांत होना

    Bhakti Yatra में हर मंदिर एक “स्टॉप” नहीं होता।
    वो एक स्टेशन होता है—जहाँ आपकी थकान उतरती है, और विश्वास चढ़ता है।


    4) पहला पड़ाव: खडकेश्वर महादेव — “शुरुआत वहीं से, जहाँ भरोसा मिलता है”

    राइड आगे बढ़ती है।
    शहर जाग चुका है।
    कहीं ट्रैफिक का शोर, कहीं स्कूल की बसें, कहीं दुकानों के शटर…

    और फिर आप पहुँचते हैं: खडकेश्वर महादेव
    (Keyword: “Shri Khadkeshwar Mahadev Mandir, Khadkeshwar”)

    कुछ जगहों पर शांति “साइलेंस” में नहीं, ऊर्जा में होती है।
    खडकेश्वर में वही ऊर्जा मिलती है।
    यहाँ खड़े होकर लगता है—
    “हाँ… आज का दिन ठीक रहेगा।”

    मंदिर के बाहर लोग आते-जाते हैं। कोई जल्दी में है, कोई इत्मीनान से।
    लेकिन शिवलिंग के सामने खड़े होकर सबको एक जैसा महसूस होता है:
    “मैं छोटा हूँ… पर मेरा भरोसा बड़ा है।”


    5) दूसरा अनुभव: भोलेश्वर — “जहाँ नाम ही जवाब है”

    Old City की गलियाँ—कभी-कभी उलझन जैसी लगती हैं।
    पर उसी उलझन में एक अपनापन भी है।
    आप आगे बढ़ते हैं: Gulmandi/Shahgunj belt की ओर।

    (Keyword: “Bholeshwar Mandir Gulmandi Shahgunj”)

    “भोलेश्वर”—नाम सुनते ही लगता है जैसे कोई कह रहा हो:
    “ज्यादा सोच मत… बस सौंप दे।”

    यहाँ आते ही समझ आता है कि शिव-भक्ति में भव्यता नहीं, भाव सबसे बड़ा है।
    आपको अपनी जिंदगी की पूरी कहानी बताने की जरूरत नहीं पड़ती।
    एक लाइन ही काफी होती है:
    “महादेव… बस रास्ता दिखा देना।”


    6) Chelipura का शिव-बेल्ट: माळीवाडा महादेव + हरेहरेश्वर — “रूट नहीं, रिदम बन जाता है”

    कई बार यात्रा का असली मजा “दो जगहों के बीच” होता है।
    Chelipura की तरफ जाते हुए, आप महसूस करते हैं कि शहर की धड़कन बदल रही है।
    लोगों की बोली, दुकानें, पुरानी इमारतें, और मंदिरों की श्रृंखला—सब मिलकर एक अलग रिदम बनाते हैं।

    • (Keyword: “Maliwada Mahadev Mandir Chelipura”)
    • (Keyword: “Harehareshwar Mahadev Temple Chelipura”)

    यहाँ एक चीज़ बहुत साफ दिखती है:
    भक्ति का सबसे सुंदर रूप “नियमितता” है।
    आप रोज़ थोड़ी देर भी महादेव के लिए निकालते हैं, तो मन खुद-ब-खुद मजबूत होता है।


    7) Roshan Gate: जगतईश्वर — “जहाँ भीड़ में भी शांति मिलती है”

    Old City का एक बड़ा सच यह है: यहाँ भीड़ है, आवाज़ें हैं, तेज़ी है…
    पर उसी के बीच कुछ मंदिर ऐसे हैं जहाँ पहुँचते ही दिल “धीमा” हो जाता है।

    (Keyword: “Jagateshwar Mahadev Mandir Roshan Gate”)

    जगतईश्वर के सामने खड़े होकर आपको एहसास होता है:
    दुनिया चाहे जितनी शोर करे, भीतर का मंदिर शांत हो सकता है।
    बस एक “दर” चाहिए—जहाँ आप खुद से मिल सकें।


    8) Adalat Road belt: “शिव… और शहर की रफ्तार”

    (Keyword: “Girishneshwar Temple Adalat Road”)

    यहाँ आते-आते दिन थोड़ा आगे बढ़ चुका होता है।
    शहर अपनी रफ्तार में है।
    और आप… अपनी रफ्तार छोड़कर एक अलग गति पकड़ चुके हैं।

    यही तो Bhakti Yatra का जादू है—
    आप जिंदगी की दौड़ से बाहर निकलते नहीं…
    बस दौड़ को समझना सीख जाते हैं।


    9) MGM / Indira Nagar: नागनाथ पाताळेश्वर — “गहराई का अनुभव”

    (Keyword: “Nagnath Pataleshwar Mandir MGM”)

    “पाताळेश्वर”—नाम ही बताता है: गहराई
    कभी-कभी समस्या बड़ी नहीं होती, हमारी सोच उथली होती है।
    और जब सोच गहरी होती है, समस्या छोटी हो जाती है।

    यह मंदिर आपको याद दिलाता है:
    हर सवाल का जवाब बाहर नहीं, भीतर होता है।
    बस थोड़ी गहराई चाहिए।


    10) New Usmanpura: दशमेश्वर — “आगे बढ़ना भी भक्ति है”

    (Keyword: “Dashmeshwar Shiv Mahadev Mandir New Usmanpura”)

    यहाँ एक बात दिल को छूती है:
    भक्ति का मतलब “रुकना” नहीं, आगे बढ़ना भी है।
    शिव स्थिर हैं… पर उनकी शक्ति हमें आगे बढ़ाती है।


    11) Jalna Road side: जुन्नेश्वर — “जप का असर”

    (Keyword: “Junneshwar Mahadev Mandir Jalna Road”)

    कई लोग पूछते हैं: “जप से क्या होता है?”
    जप से मन की रफ्तार कम होती है।
    और जब रफ्तार कम होती है, मन सही दिशा पकड़ लेता है।

    यहाँ बैठकर 5 मिनट भी अगर आप “ॐ नमः शिवाय” बोल लें—
    तो सच में लगता है, जैसे भीतर कोई “क्लियरेंस” हो गया।


    12) आखिरी पड़ाव: जनेश्वर — “यात्रा खत्म, पर शुरुआत यहीं से”

    (Keyword: “Janeshwar Mahadev Mandir Sambhajinagar”)

    यात्रा समाप्त होती है…
    पर मन के भीतर एक नई शुरुआत होती है।
    आप लौट रहे होते हैं, पर मन कह रहा होता है:
    “अब मैं संभल गया हूँ।”

    और यही Bhakti Yatra का असली परिणाम है—
    आत्मविश्वास की वापसी।


    13) 2–3 km City Loop (Suggested Darshan Route)

    अगर आप अपनी यात्रा आसान रखना चाहें:

    Start: City Chowk / Town Hall
    Gulmandi/Shahgunj
    Chelipura
    Roshan Gate
    Khadkeshwar
    Adalat Road
    MGM/Indira Nagar
    New UsmanpuraBack

    📌 Tip: सुबह जल्दी या शाम—भीड़ कम, अनुभव ज्यादा।


    14) महाशिवरात्रि पर इस यात्रा को “Special” कैसे बनाएं?

    महाशिवरात्रि में अगर आप Bhakti Yatra करें, तो 3 चीज़ें जरूर जोड़ें:

    (A) रुद्राभिषेक (सबसे श्रेष्ठ सेवा)

    जल/दूध/पंचामृत + “ॐ नमः शिवाय”
    ➡️ बाधा-निवारण, शांति, सफलता

    (B) महामृत्युंजय मंत्र जप

    108/1008
    ➡️ आरोग्य, भय-नाश, संकट-रक्षा

    (C) बेलपत्र अर्पण

    बेलपत्र + 108 बार “ॐ नमः शिवाय”
    ➡️ मनोकामना पूर्ति, पुण्य-वृद्धि

    और साथ में—दान-सेवा (अन्न/जल/वस्त्र)
    क्योंकि शिव-भक्ति का सबसे सुंदर रूप है: करुणा


    15) असली मोटिवेशन: “महादेव हमें बदलते नहीं, हमें हमारे ‘असल’ में लौटाते हैं”

    यह यात्रा आपको “नई जिंदगी” नहीं देती।
    यह यात्रा आपको आपकी असल जिंदगी वापस देती है—
    जिसमें आप मजबूत होते हैं, शांत होते हैं, और सही निर्णय लेते हैं।

    महादेव हमें एक सीधी बात सिखाते हैं:
    कर्म करो, चिंता छोड़ो।
    और जो आपका है, वो आपको मिलकर रहेगा।


    16) आपकी बारी: कमेंट में लिखिए

    🔱 आपका Old City में सबसे पसंदीदा महादेव मंदिर कौन-सा है?
    🔱 आपकी जिंदगी में “महादेव” ने आपको कब संभाला?

    मैं आपके कमेंट्स से अगली पोस्ट बनाऊँगा:
    “Bhakti Yatra Route – Followers Special (Best Suggestions)” 🙏

    हर हर महादेव! 🔱 | ॐ नमः शिवाय

  • 🚴‍♀️ Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!

    🚴‍♀️ Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!

    Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!

    A Powerful Message for Fitness, Unity & Environment by SAI NCOE, Fit India Movement & Indian Railways

    Chhatrapati Sambhajinagar | June 8, 2025:
    The city witnessed a vibrant wave of energy and enthusiasm this morning as SAI NCOE (Sports Authority of India – National Centre of Excellence), in collaboration with the Fit India Movement and Indian Railways, organized a grand Cycle Rally to promote fitness, environment-conscious living, and national unity.


    🌿 The Route, The Ride, The Reason

    The rally began from Seven Hills Flyover and covered nearly 15 kilometers, passing through iconic spots such as Akashwani Chowk, Kranti Chowk, and Kokanwadi Chowk, finally concluding at the starting point.

    The rally wasn’t just about pedaling — it was a moving message on wheels. The core themes emphasized included:

    • 🌍 Adopting Eco-Friendly Lifestyles
    • 💪 Spreading Awareness about the Fit India Movement
    • 🚴 Promoting Regular Bicycle Use for Health & Environment
    • 🇮🇳 Encouraging National Integration and Wellness Awareness

    🙌 Strong Leadership, Stronger Participation

    The event was successfully carried out under the valuable guidance of:

    • Mr. Pandurang Chate, Regional Director, SAI NCOE
    • Dr. Monika Ghuge, Deputy Director
    • Mr. Sumedh Tarodekar, Assistant Director

    The supporting staff and organizing teams played a pivotal role in ensuring smooth coordination throughout the rally.

    Over 40+ cyclists from across the city — including students, sports enthusiasts, coaches, and everyday citizens — actively participated. The local community too came out in support, cheering and sharing the moment across social media.


    📢 The Impact

    From fitness to friendship, environment to engagement — this rally wasn’t just an event, it was a movement in motion. Citizens applauded the initiative, and organizers expressed their commitment to holding even larger rallies in the near future.

    🗣️ “Such events inspire people to make fitness a priority and understand their role in protecting the environment,” said an enthusiastic participant.


    📸 Glimpses of the Rally

    🚴‍♀️ Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!
    🚴‍♀️ Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!

    📍 Tag your photos: #SambhajiCycles #FitIndia #SAINCOE #CycleForChange


    🔄 Let’s Keep Pedaling Forward

    Whether you’re a student, a professional, or a retired citizen — get on a cycle, get active, and become a part of this fitness revolution. Watch this space for more upcoming activities by SAI NCOE Aurangabad and Fit India!


    📌 Don’t forget to share this blog and tag someone who should join the next ride with you!


    🏷️ Hashtags (for sharing):

    #FitIndiaMovement #CycleForChange #SAINCOE #HealthyIndia #SambhajinagarEvents #FitnessGoals #EcoFriendlyLiving #RailwaysForFitness #AurangabadNews

  • MS-CIT अभ्यासक्रमात आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स (AI) टूल्सचा समावेश

    MS-CIT अभ्यासक्रमात आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स (AI) टूल्सचा समावेश

    एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमात आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स (AI) टूल्सचा समावेश करण्याची गरज

    एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमाने महाराष्ट्रात विद्यार्थ्यांसाठी एक नवीन पर्व सुरू केले आहे. मागील 24 वर्षांपासून चालू असलेल्या या अभ्यासक्रमात आता कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तंत्रज्ञानाचा समावेश करण्यात आला आहे, जो विद्यार्थ्यांना डिजिटल युगासाठी सज्ज करण्यासाठी एक महत्त्वाचा टप्पा ठरतो आहे

    कृत्रिम बुद्धिमत्ता म्हणजे काय?

    आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स म्हणजे माणसाप्रमाणे विचार करणारे आणि कृती करणारे तंत्रज्ञान. हे तंत्रज्ञान जगाच्या विविध स्तरांवर प्रभाव टाकत आहे. AI टूल्सच्या मदतीने, कम्प्युटर प्रणालींना अधिक स्मार्ट बनवले जात आहे. हे तंत्रज्ञान गेमिंग, सोशल मीडिया, आरोग्य सेवा, ई-कॉमर्स, शेती, बँकिंग अशा अनेक क्षेत्रांमध्ये क्रांतिकारी बदल घडवत आहे.

    अभ्यासक्रमातील बदल

    एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमामध्ये 100 पेक्षा जास्त अत्याधुनिक AI टूल्सचा समावेश करण्यात आला आहे. या टूल्समध्ये ChatGPT, Google Assistant, Alexa, Dall-E, Canva AI, Jubli अशा प्रसिद्ध टूल्सचा समावेश आहे. यामुळे विद्यार्थ्यांना AI च्या मूलभूत गोष्टी शिकण्याची आणि तंत्रज्ञानाचा प्रभावी वापर करण्याची संधी मिळेल.

    भविष्यातील संधी

    AI तंत्रज्ञानामुळे विद्यार्थ्यांना भविष्यात मोठ्या प्रमाणात नोकरी आणि व्यवसायाच्या संधी उपलब्ध होणार आहेत. आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स च्या वाढत्या वापरामुळे अनेक उद्योग डिजिटलरणाच्या दिशेने वाटचाल करत आहेत, ज्यामुळे नवीन कौशल्यांची गरज निर्माण होत आहे.

    समन्वयकांचे आवाहन

    एमकेसीएलचे छत्रपती संभाजीनगर जिल्हा समन्वयक निलेश झाल्टे यांनी सांगितले की, विद्यार्थ्यांनी शालेय वयातच या तंत्रज्ञानाशी परिचित व्हावे. तसेच, पालक आणि शिक्षणप्रेमींनी एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमाचा उपयोग करावा, कारण हा अभ्यासक्रम भविष्यासाठी अत्यंत उपयुक्त ठरणार आहे.

    उन्हाळी सुट्टीसाठी सुवर्णसंधी

    उन्हाळी सुट्टी विद्यार्थ्यांसाठी नवी कौशल्ये शिकण्यासाठी योग्य वेळ असतो. एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमामध्ये AI शिकून विद्यार्थ्यांना त्यांच्या भविष्यासाठी तयार होता येईल.

    • #ArtificialIntelligence
    • #AITools
    • #MaharashtraEducation
    • #FutureTechnology
    • #DigitalSkills
    • #MS-CIT
    • #AIForStudents
    • #SkillDevelopment
    • #DigitalIndia

  • भारतीय स्वातंत्र्यदिवस – Happy 75th Indepence Day 2021

    🇮🇳🇮🇳भारतीय स्वातंत्र्यदिवस🇮🇳🇮🇳

    भारतीय स्वातंत्र्यदिवस प्रतिवर्षी १५ ऑगस्ट रोजी साजरा केला जातो. ब्रिटिश साम्राज्यापासूनदिनांक १५ ऑगस्ट इ.स. १९४७ रोजी भारताला स्वातंत्र्य मिळाले. त्याच्या गौरवार्थ हा दिवस स्वातंत्र्यदिवस म्हणून देशभरात साजरा केला जातो. हा भारतातील एक राष्ट्रीय सण आहे. या दिवशी दिल्लीतील लाल किल्ल्यावरून ध्वजारोहण केले जाते. तसेच देशभरात अनेक ठिकाणी ध्वजारोहण, मिरणूवका व सांस्कृतिक कार्यक्रमांद्वारे हा दिवस साजरा केला जातो.

    🇮🇳 इतिहास🇮🇳

    १७७० पासून भारतावर इंग्रजांचे राज्य होते. १८ व्या शतकापासूनच सर्व राजांना इंग्रजान्ने आपल्या सैन्याच्या मदतीने ताब्यात ठेवले होते. १८५७ च्या स्वातंत्र्यसमारानंतर ब्रिटिशांनी त्यांची व्यवस्था अजूनच शिस्तीची केली.१८८५ साली भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ची स्थापना झाली. २० व्या शतकातमोहनदास करमचंद गांधी ह्यांनी अहिंसा बाळगतचले जाओ आंदोलन व अशी अनेक आंदोलने केली.महात्मा गांधींनी सविनय कायदेभंग चळवळीचे नेतृत्व केले. १९२९ साली लाहोर च्या सत्रात काँग्रेस ने संपूर्ण स्वराज्य ची घोषणा केली. त्यावेळी त्यांनी २६ जानेवारी हि तारीख भारताचा स्वातंत्र्यदिवस म्हणून घोषणा करायची योजना केली. १९३० साली काँग्रेस ने निवडणुका जिंकल्या. त्यानंतर संपूर्ण स्वराज्य साठी सर्व नेत्यांनी असहकार आंदोलन केले. १९४० साली मुस्लिम कार्यकर्ते हे हिंदूंपासून वेगळे झाले व त्यांनीऑल इंडिया मुस्लिम लीग ची स्थापना केली. दुसऱ्या महायुद्ध नंतर ब्रिटिशांना लक्षात आले कि आपल्याला भारतावरचे राज्य व युद्ध हे सांभाळता येणार नाही आहे. तसेच दुसऱ्या बाजूला भारतीय क्रांतिकार्यांचा जोर वाढत होता. हि गोष्ट कळल्यानंतर ब्रिटन च्या प्रधानमंत्र्यांनी जून १९४८ पर्यंत भारत पूर्णपणे स्वतंत्र करण्याची हमी दिली.अखेर दिनांक १५ ऑगस्ट १९४७ रोजीभारत स्वतंत्र झाला. पण जाताजाता त्यांनी भारतावर अजून एक घाव घालत भारताचेपाकिस्तान आणि भारत असे दोन तुकडे पाडले. पाकिस्तानी भागात राहणाऱ्या अनेक शिखमाणसांना त्यांचे घरदार,पैसा सोडून यावे लागले. अनेक लोक ह्यामध्ये मारलेही गेले. पुढे ह्या विभाजनामुळे काश्मीर चा प्रश्न हि पुढे आला.

    🇮🇳 स्वतंत्र भारत🇮🇳

    स्वतंत्र भारत २६ जानेवारी १९५० रोजी प्रजासत्ताक झाला. भारताचे संविधान तयार करण्यात बाबासाहेब आंबेडकर ह्यांचा मोलाचा वाट होता. स्वतंत्र भारताचे पहिले पंतप्रधान पंडित जवाहरलाल नेहरू , पहिले राष्ट्रपती राजेंद्र प्रसादहोते. रवींद्रनाथ टागोर ह्यांनी लिहिलेले जन गण मन हे भारताचे राष्ट्रगीत तर बंकिमचंद्र चट्टोपाध्यायह्यांनी लिहिलेले वन्दे मातरम हे राष्ट्रीय गीत म्हणून संबोधण्यात आले.

    🇮🇳स्वातंत्र्यदिवासाचा उत्सव🇮🇳

    भारतात सर्व ठिकाणी स्वातंत्र्य दिवसाची सुट्टी दिली जाते. सर्व गृहराचानांमध्ये,शाळांमध्ये,महाविद्यालये-कार्यालयांमध्ये ध्वजारोहण व ध्वजवंदन असते. राजधानी दिल्ली मध्ये राजपथावर सैन्यदले परेड करतात. त्यादिवशी बहुतांश रेडीओ चैनल तसेच दूरदर्शन वर देशभक्ती विषयी गाणी,कार्यक्रम,चित्रपट लागतात.
    ======================🇮🇳
    श्रीधर कुलकर्णी

  • लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक

    23 जुलै 1856 साली रत्नागिरी शहरात जन्मलेले लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक हे एक जहालमतवादी स्वातंत्र्यसैनिक, राजकारणी आणि पक्के पत्रकार आणि अभ्यासू लेखक होते.
    त्यांना लोकांनी लोकमान्य ही उपाधी दिली आहे ती त्यांच्या प्रेमापोटी आणि विश्वासापोटी.
    लोकमान्य हे शाळकरी जीवनापासून परखड विचारांचे आणि स्पष्टवक्ते म्हणून ओळखले जातात, “मी शेंगा खाल्या नाही मी टरफले उचलणार नाही” जे त्यांचे शाळेतले वाक्य खूपच प्रसिद्ध आहे ते त्याचच उदाहरण होय.


    एका मध्यमवयीन कुटुंबातील लोकमान्य यांचे मूळ गाव तसे दापोली तालुक्यातील चिखलगाव, परंतु वडिलांना कामामुळे रत्नागिरीस यावे लागले आणि म्हणून सर्व लोकमान्य टिळकांना रत्नागिरीचे म्हणून ओळखतात.

    शैक्षणिक वाटचाल


    लोकमान्य टिळक आणि आगरकर यांची घनिष्ठ मैत्री होती त्यांनी विष्णु शास्त्री चिपळूणकरांना सोबत घेऊन त्याकाळी म्हणजे 1880 साली पुण्यात न्यू इंग्लिश स्कुलची स्थापना केली, पुढे 1884 केळकर, दांडेकर, भांडारकर आदी मंडळींना एकत्र आणून डेक्कन एज्युकेशन सोसायटीची मुहुर्तमेढ रोवून त्या अंतर्गत 1885 साली आज पुण्यातील नामांकित फर्ग्युसन कॉलेजची स्थापना केली.


    असे हे थोर टिळक स्वतः गणित व संस्कृत हे विषय आवडीने आई उत्तम शिकवित असत.
    टिळक व आगरकर यांनी मिळून केसरी व मराठा हे दोन नियतकालिके सुरू केली.


    केसरी मराठीत आणि मराठा हे इंग्रजीत छापल्या जात होते.
    टिळकांचे अग्रलेख हा केसरीचा खरा आत्मा होता, पुण्यात प्लेगच्या साथीच्या वेळी फवारणी वरून ब्रिटिश सरकारने फवारणीच्या नावांखाली घरातील सामान बाहेर फेकून नासधूस केली तेव्हा  “सरकारचे डोके ठिकाणावर आहे काय” असा निखारा पेटवणारा अग्रलेख टिळकांनी लिहिला जो आजही सर्वांच्या लक्ष्यात आहे.


    नंतर काही कारणाने आगरकर आणि टिळकांचे काही मुद्यांवर वाद झाले.
    टिळकांनी लोकांना ब्रिटिशांविरुद्ध लोकांनी एकत्र येण्यासाठी सार्वजनिक गणेशोत्सव आणि आणि शिवजयंती उत्सवाची सुरुवात केली जी भारतीय स्वातंत्र्यलढ्यात खूप प्रभावशाली ठरली.
    या लढ्यात त्यांना ब्रिटिशांनी 6 वर्षे मंडालेच्या तुरुंगात कारावास दिला ते येरवाड्यात सुद्धा कारावासात होते.
    टिळकांनी लेखक म्हणून गीता रहस्य, ओरायन सारखे छान ग्रंथब सुद्धा लिहिले.


    प्लेगच्या साथीत त्यांनी आपला पुत्र, चुलतभाउ आणि भाच्याला गमावले होते.


    असे हे लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक 1920 साली 1 ऑगस्ट रोजी या जगाचा निरोप घेऊन इहलोकी गेले त्यांच्या पुण्यतिथी निमित्त त्यांना ही शब्दरूपी आदरांजली…

    लोकमान्य टिळक
  • जयशंकर व मेवाड हॉटेल – आश्चर्यकारक संबंध !


    मेवाड हॉटेल – औरंगाबाद स्पेशल !

    औरंगाबाद मधील गुलमंडी वरील मेवाड हॉटेल कुणाला माहिती नसेल असा जुन्या पिढीतला किंवा अलीकडच्या पिढीतला माणूस विरळच. …


    अजीब दास्ताॅं है ये कहां शुरु कहां खतम….
    असं या मेवाड हॉटेलच्या इतिहासाबाबत किंवा माहितीबाबत म्हणता येईल ! आश्चर्यचकित करून टाकणाऱ्या दोन व्यक्तींचा उल्लेख मेवाड हॉटेलच्या माहितीबद्दल किंवा इतिहासा बद्दल येथे मांडण्याचा प्रयत्न आहे. मला असलेल्या माहितीत भर टाकताना अनेक गोष्टींची शहानिशा व‌ आमचे मित्र, मेवाड लॉजचे मालक शंकर परमानंदसेठ जोशी तसेच सोमण शास्त्री यांचे नातेवाईक सुभाष आपटे ( माजी व्यवस्थापक – देवगिरी ना.सह. बॅंक) यांच्या कडूनही झाली आहे.

    मध्यप्रदेशातील इंदोरच्या होळकरांकडे भांडारकर नावाचे गृहस्थ मोठ्या पदावर होते. या भांडारकरांकडे एक हिंदी भाषिक जोशी व्यक्ती रसोईची म्हणजे स्वयंपाकाची व्यवस्था पाहत होते. या जोशींचा मुलगा म्हणजे परमानंद जोशी. परमानंद जोशीं वडिलांबरोबर भांडारकरांच्या घरातील एक लहान सदस्यच झाला होता. ह्या मुलाला तेथे राहण्याचा आणि काम करण्याचा कंटाळा आला म्हणून इंदूर सोडून आला तो औरंगाबादला !
    रेल्वे स्टेशन वरील सूर्यप्रकाश नावाच्या एका हॉटेलमध्ये त्यांला काम मिळालं. याच हॉटेलमध्ये मोतीवाला हुंडेकऱ्याच काम पाहत होते. गुलमंडीवर एक पोलिस इन्स्पेक्टर हॉटेल चालवत होता. ओळखी ओळखीतून त्यांच्या हॉटेलमध्ये परमानंद जोशी कामाला लागले. या तरूण मुलामधील चमक आणि प्रामाणिकपणा पाहून हॉटेल मालकाने त्याला बीन भांडवली २५ टक्क्यावर working partner करून घेतले. प्रामाणिकपणा, सचोटी आणि व्यवसायिक हुशारीच्या बळावर परमानंद जोशींनी ही भागीदारी ५० टक्क्यांपर्यंत नेली.

    हैदराबाद मुक्तिसंग्रामाचे वारे जोरात वाहत होते. गुलमंडीचे ठिकाण औरंगाबादच्या केंद्रस्थानी असल्यामुळे येथे अनेक सभा, चळवळी व्हायच्या. हा भाग तेव्हा जवळपास अशांतच असायचा. अशा मध्ये १९४७ साली या हॉटेल जवळ कृष्णा नावाच्या एका तरुणाचा निजामाच्या रोहिल्यांनी खून केला. या कृष्णाच्या अंत्ययात्रेला औरंगाबाद मधील दहा हजार लोक त्यावेळेस हजर होते असे म्हणतात. गुलमंडीवरचं वातावरण तंग असायचं. अशात हॉटेल दोन तीन महिने बंद राहिलं. परमानंद सेठनी मोठ्या हिमतीने आपल्या एका मित्राच्या भागीदारीत हे हॉटेल पूर्णपणे चालवायला घेतले. हे भागीदार होते जगन सेठ. तरी पण हॉटेल काही केल्या चालेना.

    पूर्वी मुंबईमध्ये ट्राम सिटीबस सारख्या चालायच्या. मुंबईच्या या ट्राम मध्ये सोमण शास्त्री नावाचे गृहस्थ कंडक्टर म्हणून काम करत होते. काम करता करता त्यांच्या मनात विरक्तीची भावना आली. निवृत्ती स्वीकारली. आपल्या जवळ असलेलं सगळं दान करून काही अल्प-स्वल्प किमतीत विकून या गृहस्थांनी भारत भ्रमण सुरू केलं. भारतभर फिरून ते औरंगाबादला विसावले. संपूर्ण भारत पालथा घातल्यामुळे सोमण शास्त्रीं कुठल्याही गावाची, तेथील स्थळाची माहिती, त्या गावचे वैशिष्ट्य अतिशय व्यवस्थितपणे सांगायचे. आपल्या या संतांच्या भूमीचा, मातीचा गुणच असा काही आहे की एखाद्या माणसांमध्ये असलेले सद्गुण, दैवी भावना येथे आल्यावर अधिक दृढ होत जातात, उपकारक होत जातात असा इतिहास आहे.
    केसरसिंग पुऱ्यातील (जिल्हा न्यायालया मागे) महादेव मंदिरात या सोमण शास्त्रींनी आश्रय घेतला. पूजा, अर्चा ध्यान आणि प्रबोधन असं कार्य सुरू झालं.

    मेवाड हॉटेल पाहिजे तसं चालत नव्हतं यासाठी काय करावं या विवंचनेत परमानंद सेठ असताना कुणा एका व्यक्तीने त्यांना सोमण शास्त्रींंना भेटण्याचा सल्ला दिला. आणि सांगितलं की या व्यक्तीने जर तुम्हाला राम राम केला तर तुमचा ऊद्धार ठरलेला आहे. परमानंद सेठ सोमण शास्त्रींकडे गेले. त्यांच्यासमोर हात जोडण्याच्या आधीच सोमण शास्त्रींनी त्यांना राम राम केला. परमानंद सेठनीं त्यांना त्यांच्या हॉटेलवर येण्यासाठी आग्रह केला. सकाळी चार वाजता जेव्हा हॉटेल उघडाल तेव्हा मी तेथे येऊन बसतो असे ते म्हणाले.

    दिव्यत्वाची प्रचीती

    दिव्यत्वाची प्रचिती आल्या प्रमाणे परमानंद सेठनी सकाळीच चार वाजता हॉटेल उघडले ‌ आणि समोर गुडघ्यापर्यंत नाडीची विजार घातलेले (आजच्या बरमोडा सारखी), खांद्यावर एक शुभ्र पांढरा पंचा असलेले सोमण शास्त्री दत्त म्हणून तेथे आधीच हजर होते. परमानंद सेठनी त्यांना थेट गल्ल्यावरच बसवले. गल्ल्यावर बसल्या बसल्या गुलमंडी भागातील एक गृहस्थ, खांडरे हे चहा प्यायला हॉटेलमध्ये आले. त्यांना चहा दिल्यावर ते बिल द्यायला काउंटरवर गेले तर सोमण शास्त्रींनी त्यांना नमस्कार केला आणि सांगितलं रोज सकाळी येऊन आपण चहा प्यायचा आणि बिल द्यायचं नाही.
    परमानंद सेठ मागच्या बाकावर बसून कुठल्याशा नवीन दिव्यत्वाचा साक्षात्कार घेत होते. साधारण साडेसात आठ वाजेपर्यंत सोमण शास्त्री ‘जय शंकर, जय शंकर’ म्हणत गल्ल्यावर बसले होते. काम करणाऱ्यांची धावपळ चालू होती कारण गिर्‍हाईकांची वर्दळ वाढली होती. सोमण शास्त्रींनी गल्ल्यावरून हात फिरवला आणि जय शंकर म्हणत ते तडक निघून गेले. जाताना रात्री येतो म्हणून सांगून गेले.


    रात्री दहा साडेदहा वाजता आल्यावर त्यांच्या हातात एक लोह चुंबक होते. त्या लोहचुंबकाने त्या काळी असलेली नाणी (खुर्दा – सुटे पैसे) वेगळे करत रात्री अकरा वाजता त्यांनी ती पूर्ण रक्कम ‘जय शंकर, जय शंकर’ म्हणत समोर मोजून मांडून ठेवली. परमानंद सेठ आणि जगन सेठचा स्वतःच्या डोळ्यांवर विश्वास बसेना. डोळ्यात तरळलेल्या अश्रूंसह त्यांनी सोमण शास्त्रींना नमस्कार केला.

    शंकर महाराज

    सोमण शास्त्री जय शंकर जय शंकर म्हणत टांग्याबिंग्याची वाट न पहाता किंवा अपेक्षाही न करता पायी निघून गेले. आता सोमण शास्त्रींना सगळे जयशंकर महाराज म्हणू लागले होते.
    हॉटेलमधील गिऱ्हाईकी वाढली. रोज सकाळी खांडरे येऊन चहा पिऊन जायचे. जय शंकर महाराजांना नमस्कार करायचे आणि त्यांचाही नमस्कार स्वीकारायचे.
    हा शिरस्ता खूप दिवस चालू होता. खाण्यापिण्याची कुठलीही इच्छा जयशंकरजींनी कधी व्यक्त केली नाही.
    एक दिवस हॉटेलमध्ये जिलेबी तयार झाली. महाराज जिलेबी खाणार का? असं विचारल्यावर त्यांनी ताज्या जिलेबीची थाळी समोर ठेवायला सांगितलीआणि त्यांनी ती सगळी जिलेबी संपवून टाकली. कोणी काही बोललं नाही. महाराज हसत म्हणाले अरे आता गिऱ्हाईकासाठी जिलेबी संपली ! दोघं मालक म्हणाले महाराज आपण दुधाने अंघोळ केली तरी आम्ही काही म्हणणार नाही!!

    एखाद्या सद्-गृहस्थाची कृपा, सद्भावना म्हणा किंवा त्यांच्यातील निर्मळ दिव्यत्व असो, ते कुणाच्या तरी प्रगती, समृद्धीचा दुवा असते, फळ ठरते! फक्त असावी लागते ती तुमची निष्ठा, आदर अन् विश्वास !!
    गुलमंडी वरील मेवाडचा कारभार, व्यवसाय ऊभारी घेऊ लागला होता. सत्तर-ऐंशी लोक काम करू लागले होते. हॉटेलचे व्यवस्थापन उत्तम जमले होते. तसेच कामगारांमध्ये शिस्त रुजवली गेली होती. प्रत्येकाला आपल्या जबाबदारीची कल्पना होती. मला आठवतं विठ्ठलराव सपकाळ नावाचे सडपातळ पण कडक स्वभावाचे गृहस्थ सगळीकडे लक्ष ठेवून सारखे हॉटेलभर फिरत असत. काम करणाऱ्या मुलांना गिऱ्हाईकाला काय हवं काय नको पासून साफसफाई व बारीक सारीक गोष्टींची जाणीव करून देण्यात ते तत्पर होते. सुपरवायझरच म्हणा ना ! अजून एक गृहस्थ कधी प्रवेशद्वारा जवळ कधी मागच्या बाजूला निघणाऱ्या दाराजवळ शांतपणे लक्ष ठेवून उभे असायचे. त्यांचं नाव होतं खेडला. परमानंदसेठ पासून त्यांचे चिरंजीव शंकरसेठनी व्यवसाय पाही पर्यंत ते नेहमी बरोबर असतं. नागेश्वर वाडीत मेवाड लॉज शेजारच खेडलानी स्वतःचं मोठ घर आहे. तसेच मुलांनी छान दुकान थाटली आहेत.
    वरील विवेचवा वरून मेवाड हॉटेलची व्यवस्था अतिशय अनुकरण करण्यासारखी होती हे लक्षात आलंच असेल. खरोखर हे व्यवस्थापन समजून घेण्यासाठी वा अभ्यास करण्यासाठी, बरेच जण, मॅनेजमेंट तज्ञ या हॉटेलच्या मालकांना भेटायचे. व्यवस्थापना बद्दल विचारायचे. या व्यवस्थापन परंपरेतून किंवा या हॉटेल मधिल व्यवस्थापनाचे तंत्र अवगत झालेल्या बऱ्याच जणांनी, काम करणाऱ्यांनी औरंगाबाद मध्ये व आसपासच्या गावांमध्ये स्वतंत्र हॉटेल्स टाकले.
    मालकांना कामगारांबद्दल आत्मीयता तर होतीच तसाच त्यांच्यावर वचक पण होता. या हॉटेलमध्ये कधी संप झाल्याचे मी ऐकले नाही.
    श्रावणातील एका सोमवारी मेवाड हॉटेलमध्ये सत्यनारायणाची पूजा, तिर्थ-प्रसाद असायचा. शंकर जोशींनी नागेश्वर वाडीत मेवाड लॉज सुरू केल्यावर श्रावणातील पूजा आणि ओळखीच्या मित्र-मंडळीसाठी भोजन सुरू केले.

    परलोक गमन


    सोमण शास्त्री-जयशंकरजींच्या परिचयातील औरंगाबाद मधिल रामभाऊ दातार, आपटे खानावळ, कुंभार वाडा, रामभाऊ जोशी, अभ्यंकर. इत्यादी कुटुंबातील सदस्यांनाही त्यांचे मार्गदर्शन, आशीर्वाद व त्यांची सेवा करण्याची संधी मिळाली. शेवटी रामभाऊ जोशी, स.भु. कॉलनी, यांच्या घरीच १९७८-७९ (अंदाजे) सोमण शास्त्रींनी देह ठेवला. त्यांचे अजून एक निकटवर्तीय दत्तात्रय खांबेटे यांनी अन्य सर्व संस्कार केले.
    एका अज्ञात देवमाणसाने औरंगाबाद मध्ये येऊन निरपेक्ष वृत्तीने जमेल तशा प्रकारे आपली दिव्य शक्ती प्रामाणिकपणे प्रयत्न करण्याची भावना, धारणा असणाऱ्यांचे बस्तान बसवण्यासाठी वापरावी हे आश्चर्यकारक व अप्रुपच वाटत नाही का?

    दिव्यत्वावरची श्रद्धा आणि श्रद्धेचं फळ म्हणजे मेवाड हॉटेल!

    आपण सर्वांनी या अमृततुल्य हॉटेलमध्ये घेतलेल्या चहा पासून दाक्षिणात्य व अन्य पदार्थांचा, जेवणाचा घेतलेला आस्वाद काही औरच होता!
    पुढे या भागिदारांनी शहागंज भागातही मेवाड हॉटेल सुरू केले. ‘मेवाड’ हा शब्द जणू खाण्यापिण्याचं एक विश्वसनीय प्रतिक ठरलं होतं. स्वादिष्ट – चवदार पदार्थ, स्वच्छता-नीटनेटकेपणा व माणुसकीचे ठिकाण ही ठरलं! नागेश्वर वाडीतील मेवाड लॉज हे परमानंद सेठचे अजून एक नंतरचे प्रतिष्ठान. पुढच्या पिढीने, दोन्ही भागीदारांच्या नात्यातील व्यक्तींनी ‘मेवाड’ हा शब्द अंतर्भूत धरून नवनवीन हॉटेल्स वेगवेगळ्या भागात सुरू केली. या व्यवसायाने दोघा भागीदारांच्या पिढ्यांना समृद्ध केलं. आज गुलमंडीवरचे मेवाड नसले तरी मेवाड हॉटेल मधील पदार्थांची चव आणि आठवणी मनात कायम आहेत.



    या बद्दल अधिक माहिती असणारांनी जरूर टाकावी. कमेंटमध्ये

  • औरंगाबाद आणि पुरे

    अनोखा वारसा पुरांचा -औरंगाबाद

    औरंगाबाद शहराला फार मोठा ऐतीहसिक वारसा लाभलेला आहे. तो आज जरी दुर्लक्षित असला तरीही त्यांची मुळे आजूनही शहरात घट्ट रोवलेली दिसतात.
    औरंगजेब याने खडकी नामक या शहराला औरंगाबाद असे नाव दिले.

    औरंगाबाद आणि पुरे - Aurangabad

    एकूण ५२ दरवाज्यांचे शहर म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या औरंगाबाद शहराचे आणखी एक वैशिष्टय म्हणजे ह्या शहरात असलेले ५४ पेक्षा अधिक “पुरे”.
    औरंगजेब याच्या सरदारांच्या छावण्या ज्या ठिकाणी पडत गेल्या त्या त्या भागांना “ पुरा “ असे संबोधल्या गेले.


    औरंगाबाद बस स्थानकापासून रेल्वे स्थानकाकडे जात असतांना त्यापैकी कर्णपुरा आणि पदमपुरा हे दोन पुरे लागतात. बिकानेर येथील राजा करणसिंह याची वस्ती कर्णपुरा भागात, तर त्याचा पुत्र पदमसिंह याची वस्ती पदमपुरा येथे होती.


    करणसिंह ह्याचा दुसरा मुलगा केशरसिंह याची वस्ती ज्या भागात होती त्यास केशरसिंहपुरा असे म्हणत. आजहि बाबा पेट्रोल पंपावरून क्रांती चौकाकडे जात असतांना केशरसिंहपुऱ्याचे अस्तित्व आपल्याला जाणविते.
    त्याच प्रमाणे जयसिंगपुरा हा जोधपुरच्या मिर्झाराजे जयसिंग यांचा जयसिंगपुरा म्हणजे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विद्यापीठाच्या प्रवेशद्वारासामोरील भाग.


    राजा अमरसिंगाचा मुलगा रावराजसिंग यांची वस्ती म्हणजे रावसपुरा.
    बुन्देलखंडातील ओरछाचा राजा पहाडसिंग यांच्या वस्तीला पहाडसिंगपुरा म्हंटले जाते, पहाडसिंगपुरा म्हणजे बेगमपुरा आणि औरंगाबाद लेण्यांच्या मधला परिसर.
    पहाडसिंग यानेच विद्यापीठ परिसरातील सोनेरी महाल बांधला. त्याचेच नातेवाईक रणमस्तखानचा रणमस्तपुरा तर कुतुबुद्दीनचा कुतुबपुरा यांचे अस्तित्व आजही औरंगाबाद शहरात जाणवते.


    शहाजीराजे यांचे चुलत भाऊ मालोजी आणि परसोजी यांच्या नावावरून मालोजीपुरा आणि परासोजीपुरा या दोन वस्त्या निर्माण झाल्या.
    अशा प्रकारे निर्माण झालेल्या वस्त्या म्हणजे आजचे औरंगाबाद शहरातील ” पुरे “.


    इतिहासातील दास्तऐवजानुसार व माहितीतले असे एकूण ५६ पुऱ्यांची नावे मला सापडली.

    ते पुरे खालील प्रमाणे. यातील बरिच ठिकाणे आजही आपले अस्तित्व टिकवून आहेत, तर काही वसाहती नामशेष झालेल्या आहेत.

    (१) बेगमपुरा (२) औरंगपुरा (३) मुकामपुरा (४) फाजलपुरा (५) अहिरपुरा (६) दावद्पुरा (७) नवाबपुरा (८) बायजीपुरा (९) दरवेशपुरा (१०) नक्षपुरा (११) कुतुबपुरा (१२) जसुपुरा (१३) सुलतानपुरा (१४) कर्णपुरा (१५) चेलीपुरा (१६) सबकर्णपुरा (१७) इस्माइलपुरा (१८) तानाजीपुरा (१९) पदमपुरा (२०) लासगोपालपुरा (२१) मंजुरपुरा (२२) हैसिंगपुरा (२३) परतबपुरा (२४) पहाडसिंगपुरा (२५) जमालपुरा (२६) मानसिंगपुरा (२७) जयसिंगपुरा (२८) जसवंतसिंगपुरा (२९) भावसिंगपुरा (३०) जयचंदपुरा (३१) जासुद्पुरा (३२) रणमस्तपुरा (३३) पैदापुरा (३४) हमीलपुरा (३५) धोतीपुरा (३६) कलहालपुरा (३७) परासोजीपुरा (३८) तबीबपुरा (३९) रावसपुरा (४०) चाकरपुरा (४१) कोतवालपुरा (४२) लालवंतपुरा (४३) असदपुरा (४४) रामपुरा (४५) रेंगटीपुरा (४६) केशरसिंगपुरा (४७) बलोचपुरा (४८) राम्बापुरा (४९) खोकडपुरा (५०) मालोजीपुरा (५१) उस्मानपुरा (५२) कागजीपुरा (५३) काबाडीपुरा (५४) किराडपुरा (५५) महमूदपुरा आणि (५६) रशीद्पुरा

    आणखी आपल्या माहितीत असेल तर कमेंटमध्ये कळवा

  • भारताची बिअर राजधानी – औरंगाबाद.


    पाण्यातच नशा आहे!

    औरंगाबादची एक प्रसिद्धी भारताची बिअर राजधानी अशी सुद्धा आहे. किंगफिशर, फाॅस्टर'स, कार्लसबर्ग, हैनेकेन (नावातील चुकभूल माफ करावी), खजुराहो या प्रसिद्ध नाममुद्रांचा (मराठीत ब्रॅंडस्!) संबंध औरंगाबाद शहराशी आहे /होता.

    वाळूजच्या औद्योगिक पट्ट्यामध्ये या नाममुद्रांच्या ब्रुअरीज आहेत/होत्या. शहरातील ब्रुअरीज 180 दशलक्ष लिटर पेक्षा अधिक बियरचे दरवर्षी उत्पादन करतात. महाराष्ट्राच्या एकूण ब्रुईंग क्षमतेच्या 70 टक्के क्षमता ही औरंगाबादच्या ब्रुअरीजमध्ये आहे. या ब्रुअरीजना दररोज जवळपास ३५ दशलक्ष लिटर पाणी लागते. औरंगाबाद शहरात सोळा मोठ्या ब्रुअरीज आणि डिस्टीलरीज आहेत.

    एकीकडे औरंगाबादकरांना प्यायला पाणी नाही आणि इकडे मद्य उत्पादक औरंगाबादकडे धावतात याचे कारण हे आहे की जायकवाडी धरणातून त्यांना सिलिका विरहित पाणी मिळते. त्यामुळे बिअरला खास चव प्राप्त होते.

    महाराष्ट्रात मुंबई-पुणे-नाशिक आणि नागपूर ही चार मद्याचा वापर करणारी मोठी शहरे आहेत आणि त्यांना लागणारा बराचसा पुरवठा औरंगाबाद मधून होतो. अनेक मद्य उत्पादक कंपन्यांमध्ये नामवंत पुढाऱ्यांचे जवळचे नातेवाईक संचालक आहेत असेही वाचनात आले होते.

    डिस्टिलरीज मध्ये ज्वारी, गहू, बाजरी, मका, बटाटा, बार्ली इ.चाही वापर केला जातो. काही लोक हलत डुलत जातांना दिसले तर त्यांना दोष देऊ नका, ते सिलिका मुक्त पाणी पिऊन चाललेले असतील! ‌‌. . -

    मूळ लेखक : रवींद्र धोंगडे

    PC- Google.