Tag: Inspirational

  • Bhakti Yatra: एक Spiritual Ride जो दिल की धड़कन को “शांत” और आत्मा को “मज़बूत” कर देती है

    Bhakti Yatra: एक Spiritual Ride जो दिल की धड़कन को “शांत” और आत्मा को “मज़बूत” कर देती है

    Bhakti Yatra: एक Spiritual Ride जो दिल की धड़कन को “शांत” और आत्मा को “मज़बूत” कर देती है

    (छत्रपती संभाजीनगर – Old City के पुराने महादेव मंदिरों की यात्रा)

    कुछ यात्राएँ रास्तों पर नहीं चलतीं… वे मन के भीतर चलती हैं।
    और कुछ राइड्स सिर्फ बाइक/स्कूटी की आवाज़ नहीं होतीं—वे जिंदगी की आवाज़ को धीमा कर देती हैं।

    आज की यह पोस्ट एक ऐसी ही यात्रा की कहानी है—Bhakti Yatra, एक Spiritual Ride, जिसमें हम छत्रपती संभाजीनगर (Aurangabad) के पुराने शहर (Old City) के भीतर और आसपास मौजूद पुराने/प्रसिद्ध महादेव मंदिरों की ओर निकलते हैं। यह कोई “टूर प्लान” नहीं—यह एक भावना है। एक अनुभव। एक रीसेट।

    कभी आपने महसूस किया है—भीड़ में रहते हुए भी मन अकेला हो जाता है?
    कभी आपने चाहा है कि बस 10 मिनट ऐसे मिल जाएँ जहाँ दिमाग की “हजार आवाज़ें” बंद हो जाएँ?
    कभी लगा है कि सब कुछ आपके कंट्रोल में होने के बाद भी भीतर कुछ टूट-सा रहा है?

    ऐसे ही किसी समय में, बिना ज्यादा सोचे, बस एक लाइन निकलती है—
    “महादेव… संभाल लेना।”
    और फिर… आप खुद को एक मंदिर के सामने खड़ा पाते हैं।


    1) Old City की सुबह: जब सड़कें भी “ॐ” बोलती हैं

    Old City की सुबह का अपना जादू है।
    गली के नुक्कड़ पर चाय की केतली की सीटी, कहीं दूर से आती मंदिर की घंटी, दुकानें खुलती हैं, लोग काम पर निकलते हैं… और इस सबके बीच, मन में एक अलग-सी शांति उतरने लगती है।

    आप हेलमेट ठीक करते हैं, बाइक स्टार्ट करते हैं, और खुद से कहते हैं—
    “आज नहीं भागना है… आज बस महसूस करना है।”

    यह वही शहर है जहाँ इतिहास सांस लेता है। जहाँ पुराने पत्थरों में भी कहानी होती है। और जहाँ शिवालय सिर्फ इमारत नहीं, आस्था का ठिकाना होते हैं।

    Bhakti Yatra की शुरुआत अक्सर किसी “तैयारी” से नहीं होती।
    यह शुरुआत होती है एक हल्के-से भाव से—
    “चलो… आज महादेव के पास।”


    2) इस यात्रा का मकसद: “मन” का मैकेनिक बनना

    हम रोज़ शरीर का ध्यान रखते हैं—खाना, पानी, नींद…
    पर मन?
    वो कहीं पीछे छूट जाता है—मीटिंग्स, पैसे, जिम्मेदारियाँ, टेंशन, तुलना… और एक दिन अचानक मन कह देता है:
    “बस… अब नहीं।”

    Bhakti Yatra वही जगह है जहाँ मन को मरम्मत की जरूरत नहीं पड़ती—वो खुद ही ठीक होने लगता है।
    क्यों?

    क्योंकि मंदिर में जाकर आपको कोई “परफेक्ट” बनने नहीं कहता।
    महादेव के सामने आप जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार हो जाते हैं।
    आपकी कमजोरी भी, आपकी ताकत भी।

    और एक बात…
    महादेव की सबसे बड़ी सीख है—
    जो टूटता है, वही तो फिर से बनता है।
    शिव “संहार” के देव हैं, लेकिन उनका संहार विनाश नहीं—नव-निर्माण है।


    3) Vlog-Feeling: कैमरा ऑन हो या ना हो—यात्रा रिकॉर्ड हो जाती है

    आजकल लोग पूछते हैं: “भाई, vlog बनाया?”
    मैं कहता हूँ: “हाँ… पर कैमरे में नहीं। दिल में।”

    क्योंकि कुछ सीन ऐसे होते हैं जो रिकॉर्डिंग में नहीं, अनुभव में कैद होते हैं—

    • मंदिर के सामने हाथ जोड़ते ही अचानक आँखें नम होना
    • घंटी की आवाज़ में पुराने दुखों का पिघलना
    • आरती के धुएँ में मन का हल्का होना
    • और “ॐ नमः शिवाय” बोलते हुए भीतर की आवाज़ का शांत होना

    Bhakti Yatra में हर मंदिर एक “स्टॉप” नहीं होता।
    वो एक स्टेशन होता है—जहाँ आपकी थकान उतरती है, और विश्वास चढ़ता है।


    4) पहला पड़ाव: खडकेश्वर महादेव — “शुरुआत वहीं से, जहाँ भरोसा मिलता है”

    राइड आगे बढ़ती है।
    शहर जाग चुका है।
    कहीं ट्रैफिक का शोर, कहीं स्कूल की बसें, कहीं दुकानों के शटर…

    और फिर आप पहुँचते हैं: खडकेश्वर महादेव
    (Keyword: “Shri Khadkeshwar Mahadev Mandir, Khadkeshwar”)

    कुछ जगहों पर शांति “साइलेंस” में नहीं, ऊर्जा में होती है।
    खडकेश्वर में वही ऊर्जा मिलती है।
    यहाँ खड़े होकर लगता है—
    “हाँ… आज का दिन ठीक रहेगा।”

    मंदिर के बाहर लोग आते-जाते हैं। कोई जल्दी में है, कोई इत्मीनान से।
    लेकिन शिवलिंग के सामने खड़े होकर सबको एक जैसा महसूस होता है:
    “मैं छोटा हूँ… पर मेरा भरोसा बड़ा है।”


    5) दूसरा अनुभव: भोलेश्वर — “जहाँ नाम ही जवाब है”

    Old City की गलियाँ—कभी-कभी उलझन जैसी लगती हैं।
    पर उसी उलझन में एक अपनापन भी है।
    आप आगे बढ़ते हैं: Gulmandi/Shahgunj belt की ओर।

    (Keyword: “Bholeshwar Mandir Gulmandi Shahgunj”)

    “भोलेश्वर”—नाम सुनते ही लगता है जैसे कोई कह रहा हो:
    “ज्यादा सोच मत… बस सौंप दे।”

    यहाँ आते ही समझ आता है कि शिव-भक्ति में भव्यता नहीं, भाव सबसे बड़ा है।
    आपको अपनी जिंदगी की पूरी कहानी बताने की जरूरत नहीं पड़ती।
    एक लाइन ही काफी होती है:
    “महादेव… बस रास्ता दिखा देना।”


    6) Chelipura का शिव-बेल्ट: माळीवाडा महादेव + हरेहरेश्वर — “रूट नहीं, रिदम बन जाता है”

    कई बार यात्रा का असली मजा “दो जगहों के बीच” होता है।
    Chelipura की तरफ जाते हुए, आप महसूस करते हैं कि शहर की धड़कन बदल रही है।
    लोगों की बोली, दुकानें, पुरानी इमारतें, और मंदिरों की श्रृंखला—सब मिलकर एक अलग रिदम बनाते हैं।

    • (Keyword: “Maliwada Mahadev Mandir Chelipura”)
    • (Keyword: “Harehareshwar Mahadev Temple Chelipura”)

    यहाँ एक चीज़ बहुत साफ दिखती है:
    भक्ति का सबसे सुंदर रूप “नियमितता” है।
    आप रोज़ थोड़ी देर भी महादेव के लिए निकालते हैं, तो मन खुद-ब-खुद मजबूत होता है।


    7) Roshan Gate: जगतईश्वर — “जहाँ भीड़ में भी शांति मिलती है”

    Old City का एक बड़ा सच यह है: यहाँ भीड़ है, आवाज़ें हैं, तेज़ी है…
    पर उसी के बीच कुछ मंदिर ऐसे हैं जहाँ पहुँचते ही दिल “धीमा” हो जाता है।

    (Keyword: “Jagateshwar Mahadev Mandir Roshan Gate”)

    जगतईश्वर के सामने खड़े होकर आपको एहसास होता है:
    दुनिया चाहे जितनी शोर करे, भीतर का मंदिर शांत हो सकता है।
    बस एक “दर” चाहिए—जहाँ आप खुद से मिल सकें।


    8) Adalat Road belt: “शिव… और शहर की रफ्तार”

    (Keyword: “Girishneshwar Temple Adalat Road”)

    यहाँ आते-आते दिन थोड़ा आगे बढ़ चुका होता है।
    शहर अपनी रफ्तार में है।
    और आप… अपनी रफ्तार छोड़कर एक अलग गति पकड़ चुके हैं।

    यही तो Bhakti Yatra का जादू है—
    आप जिंदगी की दौड़ से बाहर निकलते नहीं…
    बस दौड़ को समझना सीख जाते हैं।


    9) MGM / Indira Nagar: नागनाथ पाताळेश्वर — “गहराई का अनुभव”

    (Keyword: “Nagnath Pataleshwar Mandir MGM”)

    “पाताळेश्वर”—नाम ही बताता है: गहराई
    कभी-कभी समस्या बड़ी नहीं होती, हमारी सोच उथली होती है।
    और जब सोच गहरी होती है, समस्या छोटी हो जाती है।

    यह मंदिर आपको याद दिलाता है:
    हर सवाल का जवाब बाहर नहीं, भीतर होता है।
    बस थोड़ी गहराई चाहिए।


    10) New Usmanpura: दशमेश्वर — “आगे बढ़ना भी भक्ति है”

    (Keyword: “Dashmeshwar Shiv Mahadev Mandir New Usmanpura”)

    यहाँ एक बात दिल को छूती है:
    भक्ति का मतलब “रुकना” नहीं, आगे बढ़ना भी है।
    शिव स्थिर हैं… पर उनकी शक्ति हमें आगे बढ़ाती है।


    11) Jalna Road side: जुन्नेश्वर — “जप का असर”

    (Keyword: “Junneshwar Mahadev Mandir Jalna Road”)

    कई लोग पूछते हैं: “जप से क्या होता है?”
    जप से मन की रफ्तार कम होती है।
    और जब रफ्तार कम होती है, मन सही दिशा पकड़ लेता है।

    यहाँ बैठकर 5 मिनट भी अगर आप “ॐ नमः शिवाय” बोल लें—
    तो सच में लगता है, जैसे भीतर कोई “क्लियरेंस” हो गया।


    12) आखिरी पड़ाव: जनेश्वर — “यात्रा खत्म, पर शुरुआत यहीं से”

    (Keyword: “Janeshwar Mahadev Mandir Sambhajinagar”)

    यात्रा समाप्त होती है…
    पर मन के भीतर एक नई शुरुआत होती है।
    आप लौट रहे होते हैं, पर मन कह रहा होता है:
    “अब मैं संभल गया हूँ।”

    और यही Bhakti Yatra का असली परिणाम है—
    आत्मविश्वास की वापसी।


    13) 2–3 km City Loop (Suggested Darshan Route)

    अगर आप अपनी यात्रा आसान रखना चाहें:

    Start: City Chowk / Town Hall
    Gulmandi/Shahgunj
    Chelipura
    Roshan Gate
    Khadkeshwar
    Adalat Road
    MGM/Indira Nagar
    New UsmanpuraBack

    📌 Tip: सुबह जल्दी या शाम—भीड़ कम, अनुभव ज्यादा।


    14) महाशिवरात्रि पर इस यात्रा को “Special” कैसे बनाएं?

    महाशिवरात्रि में अगर आप Bhakti Yatra करें, तो 3 चीज़ें जरूर जोड़ें:

    (A) रुद्राभिषेक (सबसे श्रेष्ठ सेवा)

    जल/दूध/पंचामृत + “ॐ नमः शिवाय”
    ➡️ बाधा-निवारण, शांति, सफलता

    (B) महामृत्युंजय मंत्र जप

    108/1008
    ➡️ आरोग्य, भय-नाश, संकट-रक्षा

    (C) बेलपत्र अर्पण

    बेलपत्र + 108 बार “ॐ नमः शिवाय”
    ➡️ मनोकामना पूर्ति, पुण्य-वृद्धि

    और साथ में—दान-सेवा (अन्न/जल/वस्त्र)
    क्योंकि शिव-भक्ति का सबसे सुंदर रूप है: करुणा


    15) असली मोटिवेशन: “महादेव हमें बदलते नहीं, हमें हमारे ‘असल’ में लौटाते हैं”

    यह यात्रा आपको “नई जिंदगी” नहीं देती।
    यह यात्रा आपको आपकी असल जिंदगी वापस देती है—
    जिसमें आप मजबूत होते हैं, शांत होते हैं, और सही निर्णय लेते हैं।

    महादेव हमें एक सीधी बात सिखाते हैं:
    कर्म करो, चिंता छोड़ो।
    और जो आपका है, वो आपको मिलकर रहेगा।


    16) आपकी बारी: कमेंट में लिखिए

    🔱 आपका Old City में सबसे पसंदीदा महादेव मंदिर कौन-सा है?
    🔱 आपकी जिंदगी में “महादेव” ने आपको कब संभाला?

    मैं आपके कमेंट्स से अगली पोस्ट बनाऊँगा:
    “Bhakti Yatra Route – Followers Special (Best Suggestions)” 🙏

    हर हर महादेव! 🔱 | ॐ नमः शिवाय

  • Bombay High Court Clerk Recruitment 2025–26 | बॉम्बे हायकोर्ट लिपिक भरती – Full Details

    Bombay High Court Clerk Recruitment 2025–26 | बॉम्बे हायकोर्ट लिपिक भरती – Full Details

    Bombay High Court has announced a major recruitment drive for Clerk (लिपिक) posts for the year 2025–26. This is an excellent opportunity for graduates with typing and computer skills.
    खाली संपूर्ण माहिती मराठी + English mix मध्ये दिली आहे, so that everyone can easily understand.


    🏛️ Total Vacancies (एकूण पदे)

    Location (खंडपीठ)Vacancies
    Mumbai (Principal Seat)830
    Nagpur Bench166
    Aurangabad Bench336

    Total Posts: 1332
    (4% reservation for persons with disabilities included.)


    🎓 Eligibility Criteria (पात्रता अटी)

    1. Age Limit (वयमर्यादा)

    • General Category: 18 to 38 years
    • SC/ST/OBC/SBC: 18 to 43 years
    • Govt/High Court Employees: No upper age limit

    2. Educational Qualification (शैक्षणिक पात्रता)

    • Graduation from recognized University
    • English Typing 40 wpm (GCC / ITI / GCC-TBC)
    • Computer Skills compulsory
      (MS-CIT / Govt Approved Course / MS Office knowledge)

    3. Other Essential Conditions (इतर महत्वाच्या अटी)

    • Must be domicile of Maharashtra
    • No criminal convictions
    • After 28 March 2005, उमेदवाराकडे 2 पेक्षा जास्त मुलं नसावीत
    • Marathi वाचणे, लिहिणे आणि बोलणे आवश्यक
    • Candidate should not have more than one living spouse

    📝 Selection Process (निवड प्रक्रिया)

    Selection will happen in three stages:

    1️⃣ Screening Test – 90 Marks

    Minimum qualifying: 45 marks
    Subjects & Marks:

    • Marathi – 10
    • English – 20
    • General Knowledge – 10
    • General Intelligence – 20
    • Arithmetic – 20
    • Computer – 10

    2️⃣ English Typing Test – 20 Marks

    • Duration: 10 minutes
    • Passage of 400 words
    • Minimum qualifying marks: 10
    • Exam will be conducted on Computer only

    3️⃣ Interview (मुलाखत) – 40 Marks

    Only candidates who clear Screening + Typing will be called.


    🌐 How to Apply (अर्ज कसा करावा?)

    • Application Mode: Online only
    • Official Website: 👉 https://bombayhighcourt.nic.in
    • Go to: Recruitment → Clerk → Apply Online
    • Application Fee: ₹1,000 (through SBI Collect)
    • Fee is non-refundable

    📅 Important Dates (महत्वाच्या तारखा)

    • Application Start: 15 December 2025 (11:00 AM)
    • Application End: 5 January 2026 (5:00 PM)

    ⚠️ Important Instructions (महत्वाच्या सूचना)

    • तुम्ही एकच खंडपीठ निवडू शकता (Change not allowed later)
    • First 5 years transfer नाही
    • Hall Ticket, Result, Updates फक्त website वरूनच मिळतील
    • Selection list & Waiting list will be valid for 2 years
    • Initial 2 years probation period (प्रवेशन कालावधी)

    🌟 Conclusion (निष्कर्ष)

    This recruitment from the Bombay High Court is a great opportunity for graduates looking for a stable and respected government job.
    जर तुमच्याकडे Degree + Typing + Computer Skills असतील तर ही संधी चुकवू नका!

  • Math-Quiz 30-11-2025

    [ays_quiz id=”2″]

  • 🚴‍♀️ Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!

    🚴‍♀️ Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!

    Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!

    A Powerful Message for Fitness, Unity & Environment by SAI NCOE, Fit India Movement & Indian Railways

    Chhatrapati Sambhajinagar | June 8, 2025:
    The city witnessed a vibrant wave of energy and enthusiasm this morning as SAI NCOE (Sports Authority of India – National Centre of Excellence), in collaboration with the Fit India Movement and Indian Railways, organized a grand Cycle Rally to promote fitness, environment-conscious living, and national unity.


    🌿 The Route, The Ride, The Reason

    The rally began from Seven Hills Flyover and covered nearly 15 kilometers, passing through iconic spots such as Akashwani Chowk, Kranti Chowk, and Kokanwadi Chowk, finally concluding at the starting point.

    The rally wasn’t just about pedaling — it was a moving message on wheels. The core themes emphasized included:

    • 🌍 Adopting Eco-Friendly Lifestyles
    • 💪 Spreading Awareness about the Fit India Movement
    • 🚴 Promoting Regular Bicycle Use for Health & Environment
    • 🇮🇳 Encouraging National Integration and Wellness Awareness

    🙌 Strong Leadership, Stronger Participation

    The event was successfully carried out under the valuable guidance of:

    • Mr. Pandurang Chate, Regional Director, SAI NCOE
    • Dr. Monika Ghuge, Deputy Director
    • Mr. Sumedh Tarodekar, Assistant Director

    The supporting staff and organizing teams played a pivotal role in ensuring smooth coordination throughout the rally.

    Over 40+ cyclists from across the city — including students, sports enthusiasts, coaches, and everyday citizens — actively participated. The local community too came out in support, cheering and sharing the moment across social media.


    📢 The Impact

    From fitness to friendship, environment to engagement — this rally wasn’t just an event, it was a movement in motion. Citizens applauded the initiative, and organizers expressed their commitment to holding even larger rallies in the near future.

    🗣️ “Such events inspire people to make fitness a priority and understand their role in protecting the environment,” said an enthusiastic participant.


    📸 Glimpses of the Rally

    🚴‍♀️ Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!
    🚴‍♀️ Massive Cycle Rally Held in Chhatrapati Sambhajinagar!

    📍 Tag your photos: #SambhajiCycles #FitIndia #SAINCOE #CycleForChange


    🔄 Let’s Keep Pedaling Forward

    Whether you’re a student, a professional, or a retired citizen — get on a cycle, get active, and become a part of this fitness revolution. Watch this space for more upcoming activities by SAI NCOE Aurangabad and Fit India!


    📌 Don’t forget to share this blog and tag someone who should join the next ride with you!


    🏷️ Hashtags (for sharing):

    #FitIndiaMovement #CycleForChange #SAINCOE #HealthyIndia #SambhajinagarEvents #FitnessGoals #EcoFriendlyLiving #RailwaysForFitness #AurangabadNews

  • MS-CIT अभ्यासक्रमात आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स (AI) टूल्सचा समावेश

    MS-CIT अभ्यासक्रमात आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स (AI) टूल्सचा समावेश

    एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमात आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स (AI) टूल्सचा समावेश करण्याची गरज

    एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमाने महाराष्ट्रात विद्यार्थ्यांसाठी एक नवीन पर्व सुरू केले आहे. मागील 24 वर्षांपासून चालू असलेल्या या अभ्यासक्रमात आता कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तंत्रज्ञानाचा समावेश करण्यात आला आहे, जो विद्यार्थ्यांना डिजिटल युगासाठी सज्ज करण्यासाठी एक महत्त्वाचा टप्पा ठरतो आहे

    कृत्रिम बुद्धिमत्ता म्हणजे काय?

    आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स म्हणजे माणसाप्रमाणे विचार करणारे आणि कृती करणारे तंत्रज्ञान. हे तंत्रज्ञान जगाच्या विविध स्तरांवर प्रभाव टाकत आहे. AI टूल्सच्या मदतीने, कम्प्युटर प्रणालींना अधिक स्मार्ट बनवले जात आहे. हे तंत्रज्ञान गेमिंग, सोशल मीडिया, आरोग्य सेवा, ई-कॉमर्स, शेती, बँकिंग अशा अनेक क्षेत्रांमध्ये क्रांतिकारी बदल घडवत आहे.

    अभ्यासक्रमातील बदल

    एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमामध्ये 100 पेक्षा जास्त अत्याधुनिक AI टूल्सचा समावेश करण्यात आला आहे. या टूल्समध्ये ChatGPT, Google Assistant, Alexa, Dall-E, Canva AI, Jubli अशा प्रसिद्ध टूल्सचा समावेश आहे. यामुळे विद्यार्थ्यांना AI च्या मूलभूत गोष्टी शिकण्याची आणि तंत्रज्ञानाचा प्रभावी वापर करण्याची संधी मिळेल.

    भविष्यातील संधी

    AI तंत्रज्ञानामुळे विद्यार्थ्यांना भविष्यात मोठ्या प्रमाणात नोकरी आणि व्यवसायाच्या संधी उपलब्ध होणार आहेत. आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स च्या वाढत्या वापरामुळे अनेक उद्योग डिजिटलरणाच्या दिशेने वाटचाल करत आहेत, ज्यामुळे नवीन कौशल्यांची गरज निर्माण होत आहे.

    समन्वयकांचे आवाहन

    एमकेसीएलचे छत्रपती संभाजीनगर जिल्हा समन्वयक निलेश झाल्टे यांनी सांगितले की, विद्यार्थ्यांनी शालेय वयातच या तंत्रज्ञानाशी परिचित व्हावे. तसेच, पालक आणि शिक्षणप्रेमींनी एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमाचा उपयोग करावा, कारण हा अभ्यासक्रम भविष्यासाठी अत्यंत उपयुक्त ठरणार आहे.

    उन्हाळी सुट्टीसाठी सुवर्णसंधी

    उन्हाळी सुट्टी विद्यार्थ्यांसाठी नवी कौशल्ये शिकण्यासाठी योग्य वेळ असतो. एमएस-सीआयटी अभ्यासक्रमामध्ये AI शिकून विद्यार्थ्यांना त्यांच्या भविष्यासाठी तयार होता येईल.

    • #ArtificialIntelligence
    • #AITools
    • #MaharashtraEducation
    • #FutureTechnology
    • #DigitalSkills
    • #MS-CIT
    • #AIForStudents
    • #SkillDevelopment
    • #DigitalIndia

  • गृहिणी

    या कवितेचे कवी कोण आहेत माहित नाही परंतु फारच छान कविता आहे
    👌👌👇
    गृहिणी आहे हे सांगतांना
    अजिबात लाजायचं नाही
    ” घर सांभाळणं ” हे काम
    वाटतं तेवढं सोप्पं नाही

    ती घर सांभाळते म्हणून
    बाकीचे relax असतात
    आपापल्या क्षेत्रामध्ये
    उत्कृष्ट काम करू शकतात

    घराघरातली प्रसन्न गृहिणी
    पायाचा दगड असते
    घराण्याची सुंदर इमारत
    तिच्यामुळेच उभी असते

    घर सांभाळणाऱ्या गृहिणीला
    कधीही कमी लेखू नये
    नौकरी करत नाही म्हणून
    कोणीच तिला टोकू नये

    तिच्या कष्टाचं मोल लावल्यास
    पगार देऊ शकणार का ?
    इतके काबाड कष्ट आपण
    कधी करू शकणार का ?

    नौकरी करणाऱ्या स्त्रियांचं
    निश्चितच कौतुक आहे
    पण समजू नका गृहिणी मध्ये
    काहीतरी कमी आहे

    खरं सांगा गृहिणी सारखी
    कोणती व्यक्ती उदार असते
    घरातल्या सर्वांसाठी
    जी फुकटात राबत असते

    दर महिण्याला पगार मिळतो
    म्हणून आपण नौकरी करतो
    चोवीस तास राबणाऱ्या
    गृहिणीला काय देतो ?

    गृहिणीला पॅकेज देण्याची
    तुमची माझी श्रीमंती नाही
    डॉक्टर , इंजिनियर , बँकर पेक्षा
    तिचा हुद्दा कमी नाही

    मानधन नाही , सुट्टी नाही
    तरीही हसमुख असते ” ती “
    घराचं घरपण टिकून असतं
    जोपर्यंत असते ” ती “

    गृहिणी आहे हे सांगतांना
    मान खाली घालू नका
    बाकीच्यांनी तिच्या समोर
    मुळीच चरचर बोलू नका

    म्हणून म्हणतो गृहिणीचा
    आदर आपण केला पाहिजे
    अन्नपूर्णा , लक्ष्मीला
    पहिला मान दिला पाहिजे

  • देवमाणूस देवाघरी

    देवमाणूस देवाघरी


    सद्गुरु मंगलनाथ महाराज (चित्रकूट-कर्वी) यांचे शिष्य कर्मयोगी शिवशंकरभाऊ पाटील :

    ▪️कामिका एकादशी दिनी आज सायंकाळी 5.31 वाजता घेतला अखेरचा श्वास..
    ▪️ घरापुढील शेतातच सायंकाळी 7:30 वाजता अंत्यसंस्कार..
    ‘कर्मयोगी’ सेवाध्यायाची इतिश्री!

    श्री क्षेत्र शेगाव:
    माणसातला ‘देव’ कुठे असतो?.. याचा पत्ता होता- शिवशंकरभाऊ पाटील. ‘कर्मयोग’ काय असतो, याचे ठिकाण होते- शिवशंकरभाऊ पाटील. ‘सेवाभाव’ काय असतो, याचे प्रतिक होते- शिवशंकरभाऊ अन्
    व्यवस्थापन काय असते? याचे प्रत्यंतर होते- शिवशंकरभाऊ पाटील!

    नावात ‘शिव’ अन् ‘शंकर’ म्हणजे ‘त्रिनेत्र’च नाहीतर, यत्र-तत्र-सर्वत्र असे सर्वव्यापी ‘नेत्र’ म्हणजे पारखी नजर अन् सेवात्मक ‘दृष्टी’ ज्यांच्याकडे होती, की ज्यामुळे श्रीसंत गजानन महाराज संस्थान शेगावमध्ये भक्तीमय ‘सृष्टी’ फुलली..
    असे हजारो सेवाधारी निर्माण करणारे, शिवशंकरभाऊ पाटील!!

    भगवान श्रीकृष्णाने धनुर्धर अर्जुनाला कुरुक्षेत्रावर ‘कर्मयोग’ सांगितला, पण ‘सेवा परमो: धर्म’ ही धारणा ठेवून जे ‘कर्मयोगी’ ठरले..
    ते शिवशंकरभाऊ पाटील!!

    श्रीगजानन विजय ग्रंथाचे २१ अध्याय आहेत, त्यातल्या एक सेवाध्याय ठरावा.. अशा सेवायुगाची सांगता, अर्थातच ‘कर्मयोगी’ सेवाध्यायाची इतिश्री झाली..
    संस्थानचे व्यवस्थापकीय विश्वस्त शिवशंकरभाऊ पाटील यांच्या जाण्याने.

    मंदीरं महाराष्ट्रात, देशात अन् जगात असंख्य आहेत.. पण ती मंदीरं तिथल्या ‘देवामुळं’ ओळखली जातात, पण एकमेव शेगावचे असे मंदीर, की जे श्रीसंत गजानन महाराजांमुळे तर ओळखले जातेच.. पण निष्काम-निस्वार्थ सेवाकार्यासाठी ते मंदीर ओळखल्या जाते, ते शिवशंकरभाऊ पाटील यांच्यासारख्या देवमाणसांमुळे. म्हणूनच कुठल्याही देवापुढे माथा न टेकविणाऱ्या शरद पवारांचा माथा शिवशंकरभाऊंच्या चरणांवर आदरानं नतमस्तक होतो. माणसातल्या देवमाणसाची ‘दिव्यत्वाची प्रचिती’ तिथेच करकमल जुळल्यावर येते!

    कोण होते शिवशंकरभाऊ?
    एक साधा अन् तेवढाच सरळ माणूस. धोतर-कुर्ता अन् टोपी परिधान करणारे सामान्य व्यक्ती. जे काही करतो आहे, ते ‘श्री’ कृपेने.. त्यामुळे उभ्या आयुष्यात ‘पद्मश्री’ व ‘पद्मविभुषण’सारखे अनेक पुरस्कार या माणसाने हात जोडून विनम्रपणे नाकारले.. व आकार देत राहीला फक्त हा माणूस, संस्थानच्या सेवाभावी प्रकल्पांना.. मज पामराशी काय थोरपण, पायीची वहाण पायी बरी.. या तुकोबारायांच्या जाणीवेतून!

    शिवशंकर सुखदेव पाटील,
    शेगावी १२ एप्रिल १९४० मध्ये खटला असणाऱ्या पाटलाच्या कुटुंबात जन्मले. शिक्षण अर्थातच जेमतेम. फार मोठा परिवार, पुढे लग्न करुन संसाराला लागले. २ मुले व ४ मुली यासह सुना, नातवंडे व जावई असं विस्तारलेलं कुटुंब. शेती-बाडी, गुरं-ढोरं.. असा बाडबिस्तारा सांभाळता सांभाळता हा माणूस श्री गजानन महाराज संस्थान शेगावच्या सेवाकार्याकडे वळला. ३१ ऑगस्ट १९६२ रोजी त्यांच्या संस्थानच्या विश्वस्त पदी नेमणूक झाली. १९६९ ते १९९० पर्यंत ते संस्थानचे अध्यक्ष होते, १९८१ ते १९९० पर्यंत व्यवस्थापकीय विश्वस्त व अध्यक्ष अशा दोन्ही पदांवर ते कार्यरत होते. तर सध्या ते व्यवस्थापकीय विश्वस्त म्हणून काम पाहत होते. शिक्षण संस्थेचे अध्यक्ष व शेगावचे नगराध्यक्षही राहून गेले.

    सेवात्याग व समर्पणाचे धनी असलेले शिवशंकरभाऊ पाटील यांच्या संकल्पनेतून श्री संत गजानन महाराज संस्थानचे सेवाकार्य अविरत सुरु राहीले. एकूण ४२ प्रकल्प त्यांच्या प्रेरणेने उभे राहीले. भक्तांच्या सेवेसह आदिवासींच्या सेवेपासून तर अन्नदान तसेच कपडेदान, वैद्यकीय सेवा, मोफत औषधोपचार, शिक्षण, पर्यावरण व अध्यात्मीक सेवेच्या माध्यमातून नवा आदर्श घडवत असतांना शिवशंकरभाऊंच्या कल्पकतेतून जे ‘आनंद सागर’ साकारले होते, तो पर्यटनाचा विलोभनीय भक्तीमय प्रयोगच!

    श्री संत गजानन महाराज संस्थान शेगावच्या माध्यमातून मंदीर व्यवस्थापनाचा उत्तम नमुना म्हणून गणना होते. वयाच्या १८व्या वर्षीच त्यांनी संस्थानच्या सेवायज्ञात स्वत:ला झोकून दिले होते, तेंव्हापासून त्यांनी हे व्रत अखंडपणे चालविले. श्रध्दा, विश्वास अन् भक्ती या त्रिसुत्रीच्या माध्यमातून भाऊसाहेबांनी कार्य करतांना भक्तांच्या निवासाची अल्पदरात केलेली व्यवस्था ही आगळी-वेगळी ठरली. टाळकरी, माळकरी व वारकरी हे संस्थानचे स्तंभ असून येथील जवळपास ३६००च्यावर सेवाधारी हे बिनपगारी अन् फुल अधिकारी, याचे उत्तम उदाहरण आहे. संस्थानने स्वतंत्र असा सेवाधारी विभाग स्थापन केला असून, त्यांच्या कुटुंबीयांच्या सुख-दु:खात संस्थान हे सदैव मायेचा हात देत असते. यामुळेच अनेक सेवाधारी वेटींगवर कायम असतात. इथल्या सेवाधाऱ्यांचा सेवाभाव हा संशोधनात्मक अभ्यासाचा स्वतंत्र विषय असून, त्यावर अनेक माध्यमांनी विविध माध्यमातून टाकल्याचा प्रकाश, हा उल्लेखनीय ठरतो. म्हणूनच इथल्या सेवाधाऱ्यांचा सेवायज्ञ हा सर्वत्र चर्चेचा व कुतूहलाचा विषय._
    सेवाधाऱ्यांच्या मुखात कायम एकच शब्द असतो, माऊली..!

    श्री संत गजानन महाराज शेगावच्या भक्तीमय शाखा या पंढरपूर, त्र्यंबकेश्वर, आळंदी व ओमकारेश्वर येथेही आहेत. २ हजार मानसेवी, ३ हजार स्वयंसेवक व तेवढ्याच सेवाधारी युवकांची प्रतिक्षा यादी असते. कोरोना काळापुर्वी दररोज ५० हजार भाविकांना प्रसाद वाटपाची व्यवस्था भक्तनिवासातील ३ हजार खोल्या, वैद्यकीय लोकोत्तर सेवाकार्य, अभियांत्रिकी महाविद्यालय, हजारो वारकरी दिड्यांना भजनी साहित्याचे वाटप.. हे सर्वत्र सुरु असते. कोरोना काळात ज्यावेळी मंदीरं सुरु झाले होते, त्यावेळी दर्शनाची व्यवस्था कोरोना नियमांचे पालन करुन कशी असावी? हा आदर्श इतर मंदीरांना जो घालून देण्यात आला, त्यामागे प्रेरणा शिवशंकरभाऊंचीच. ‘पैसा साचू देवू नका, पैशाला स्पर्श करु नका अन् पैसा कुणाकडे मागू नका..’ हे संत गजानन महाराजांनी संस्थान स्थापन करतांना सांगितलेलं तत्व, शिवशंकरभाऊ पाटील यांनी उभ्या हयातीत जपलं. त्यामुळेच शिवसेनाप्रमुख बाळासाहेब ठाकरे हे ‘सामना’तून त्यांच्यावर स्तृतीसुमनांचा वर्षाव करुन गेले तर शरद पवारांनी शिवशंकर भाऊंपुढे नतमस्तक होण्याची इच्छा जाहीरपणे प्रकट केली होती. परंतु भाऊंचे मस्तक सदैव ‘श्री’चरणी झुकलेले राहीले अन् त्यांनी ‘श्री’च्या सेवेतच घेतला अंतिम श्वास..
    देवमाणूस देवाघरी गेला,
    अन् झाली ‘कर्मयोगी’ सेवाध्यायाची इतिश्री!:

    भाऊंनी आपल्या वडिलांच्या मार्गदर्शनाखाली शेगाव संस्थानात आपली सेवा मंदिरात फरशी बसवण्यापासून सुरु करून त्याच संस्थेच्या व्यवस्थापक बनल्यानंतर भाउंनी मागे वळून बघितलं नाही.

    ज्यावेळी भाउंनी संस्थेच्या कामाची सूत्रं घेतली तेव्हा संस्थेची उलाढाल अवघी ४५ लाख रुपयांची होती. आज शेगाव संस्थानाची वार्षिक उलाढाल १४० कोटी रुपयांपेक्षा जास्त आहे.

    पण मंदिराला बिझनेस न बनवता भाऊंनी ज्या तऱ्हेने शेगाव संस्थांनाचं उदाहरण उभं केलं आहे त्याला तोड नाही. हिशोबातला काटेकोरपणा, पारदर्शकता, निस्वार्थी सेवा आणि सगळ्यात महत्वाची असणारी स्वच्छता ह्याला आपल्या सोबत प्रत्येक सेवेकरी आणि तोच भाव इकडे येणाऱ्या प्रत्येक भाविकाच्या मनात निर्माण करताना भाउंनी एक आदर्श उदाहरण प्रत्येकासमोर ठेवलं आहे.

    शेगाव संस्थानाला जागतिक नकाशावर नेण्यामागे तपश्चर्या आहे ती एका योगीची. तो योगी म्हणजेच शिवशंकर भाऊ पाटील. कोणतंही मंदिर म्हंटल की त्यात श्रद्धाभाव येतो.

    भाविक श्रद्धेने त्या शक्तीपुढे नमन करतात पण सेवाभाव जागृत करायला लागते ती वृत्ती. ती निर्माण करण्याचं श्रेय शिवशंकर भाऊ पाटील ह्याचं आहे.

    आज ११,००० पेक्षा जास्ती सेवेकरी प्रतीक्षा रांगेत उभे आहेत. सेवा ज्यात कोणतंही मानधन दिलं जात नाही तर सेवा संपल्यावर एक प्रसादाचा नारळ घेऊन सेवेकरी आपल्या पुढच्या मार्गाला प्रस्थान करतो. १७,००० पेक्षा जास्त सेवेकरी आज शेगाव संस्थानात अश्या प्रकारे निस्वार्थी सेवा देतात.

    हा निस्वार्थी भाव प्रत्येक सेवा देणाऱ्याच्या मनात उत्पन केल्यामुळेच आज शेगाव हे देवस्थान केवळ भारतात नव्हे तर जगभरात आपलं वेगळेपण टिकवून आहे.

    शेगाव देवस्थान प्रसिद्ध आहे ते सोन्या चांदीने मढवलेल्या मुर्त्यांनी नव्हे तर इथल्या स्वच्छतेमुळे. संस्थानाच्या अखिरात्यात येणाऱ्या प्रत्येक ठिकाणची स्वच्छता ही सगळ्यांच्या नजरेत भरते.

    श्री गजानन मंदिर असो वा भक्तनिवास, आनंदसागर सारखा ६५० एकर इतक्या प्रचंड जागेत वसलेला प्रकल्प असो वा महारष्ट्रातील सर्वोत्तम असणारं अभियांत्रिकी कॉलेज ह्या सगळ्याच ठिकाणी कागदाचा एक कपटा आणि झाडावरून गळलेलं पान मिळणं मुश्कील इतकी कमालीची स्वच्छता राखली जाते.

    संत गजानन महाराजांचे निस्सीम भक्त असणारे जगातील अग्रगण्य बँक असणाऱ्या सिटीबँकेचे अध्यक्ष विक्रम पंडित हे भाऊंचं काम पाहून इतके थक्क झाले की त्यांनी शेगाव संस्थानाला एक दोन नाही तर तब्बल ७०० कोटी रुपये दिले.

    पण भाऊंनी ते नम्रपणे नाकारले. भाऊंनी हिशोब केला फक्त ७० कोटी रुपयांची गरज होती. तेवढेच घेऊन तब्बल ६३० कोटी रुपये शेगाव संस्थानाने सिटीबँकेला परत केले. घेतलेल्या त्या ७० कोटी रुपयांची ही सिटीबँकेला परतफेड केली.

  • कौतूकाची थाप कुठेच कमी पडायला नको

    कहाणी अनोख्या रिझल्टची

    यावर्षीचा दहावीचा रिझल्ट लागला आणि पहिल्यांदाच करोनाच्या कृपेने एका अनोख्या रिझल्टला विद्यार्थी आणि पालक सामोरे जात आहेत. परीक्षा न घेताच फक्त अंतर्गत मूल्यमापनानुसार हा निकाल लावला गेला आहे त्यामुळे या निकालाला एक ऐतिहासिक महत्व प्राप्त झाले आहे.


    परिक्षा न घेताच निकाल घोषित झाल्यामुळे या निकालाला काहिसे थट्टेचे स्वरूप प्राप्त झाले आहे. कोविड बॅच, लॉटरी रिझल्ट, मार्कांची खैरात, बिनविरोध पास अशी शेरेबाजी सुरू झाली आहे.

    Whatsapp वर अशा अनेक मीम्स, वात्रट विनोद यांचा भडीमार होत आहे. या शर्यतीत लंगड्या घोड्यांनीही बाजी मारलेय त्यामूळे पेढे वगैरे वाटून, कौतुक करण्यासारखे विशेष काहि नाहि अशी कुजकट बोलणी करणारेही काहि महाभाग आहेत.

    अशावेळी ज्यांनी करोनाच्या या महासंकटात, अत्यंत विपरीत परिस्थितीत, भांबावलेल्या मनस्थितीत, आयुष्यातील एका महत्त्वाच्या परिक्षेचा अगदि जीव तोडून अभ्यास केला आहे त्या प्रामाणिक कोवळ्या मनांवर अशाप्रकारे खिल्ली उडवून आघात करणे योग्य नाहि याची जाणीव सर्वांनी ठेवायला हवी.


    करोनाच्या या महाभयंकर संकटाला आपला देश आणि सर्व जग पहिल्यांदाच सामोरे जात आहे. कित्येक गोष्टी या test and trial basis वर केल्या जात आहेत कारण या अशा विपरीत परिस्थितीत नेमक्या काय योजना आखाव्यात, कशा प्रकारचे नियोजन करावे याचा पुर्वानुभव कोणालाच नव्हता त्यामुळे प्राप्त परिस्थितीत सरकारने हा जो काहि निर्णय शालांत परिक्षेच्या बाबतीत घेतला आहे तो योग्यच म्हणायला हवाय. दुसरा काहि पर्यायच नव्हता. मुलांच्या सुरक्षेला प्राधान्य देणे अगदि योग्यच आहे.

    न भुतो न भविष्यती


    इकडे आड तिकडे विहिर अशी परिस्थिती सर्वांचीच होती. दहावी – बारावी सारख्या महत्त्वाच्या वर्षात करोनाचे महासंकट उभे राहिले होते. घराच्या बाहेर पडणे मुश्किल झाले होते. शाळा अनिश्चित काळासाठी बंद झाल्या होत्या. परीक्षा नेमक्या कशा घेतल्या जातील याची काहिच पुर्वकल्पना विद्यार्थ्यांना आणि पालकांना तसेच शिक्षकांनासुद्धा नव्हती. सर्वच गोंधळाचे वातावरण होते. online अभ्यासात अनंत अडचणी होत्या. शेवटि प्रत्यक्ष वर्गात बसून, शिक्षकांच्या मार्गदर्शनाखाली आणि सहकारी मित्रांच्या सहवासात केलेला अभ्यास आणि घराच्या एका कोपऱ्यात बसून मोबाईलच्या छोट्याशा स्क्रीनवर यापूर्वी कधिही न अनुभवलेला असा अभ्यास यामध्ये खूपच फरक आहे. या अभ्यासाला सरावण्यासाठीच मुलांना काहि काळ लागला.

    या महत्वपूर्ण परिक्षेत उत्तम गुण मिळविण्याचे दडपण मुलांवर असतेच त्यात हि अशी विपरीत परिस्थिती…. अशावेळी मुलांची मानसिक स्थिती काय असावी याचा अंदाज न केलेलाच बरा. शहरातील मुलांना तरी त्यातल्या त्यात बऱ्यापैकी सुविधा उपलब्ध असतात पण गाव खेड्यातील मुलांच्या अभ्यासाची तर पार दैना उडाली आहे पण दोष तरी कोणाला द्यायचा ? काहि अपवाद वगळले तर बरेचसे विद्यार्थी प्रामाणिक प्रयत्न करत होते. शिक्षकांचे प्रत्यक्ष मार्गदर्शन मिळवण्यात अडचणी असल्याने यूट्यूबवर उपलब्ध असलेल्या काही शैक्षणिक सुविधांचा पर्याय शोधला जात होता. जमेल त्याप्रकारे विषय समजून घेण्यासाठी प्रयत्न केले जात होते कारण कुठल्याही स्वरूपात परीक्षा होणारच हिच धारणा होती. त्यासाठी जीव तोडून अभ्यास केला जात होता.

    हे नसे फुकाचे, प्रयत्न असे अनेकांचे

    शाळांमधून घेतल्या जाणाऱ्या विविध अंतर्गत चाचण्यांना प्रामाणिकपणे सामोरे जावे लागत होते. त्यामुळे मुलांच्या या प्रामाणिक प्रयत्नांना, मेहनतीला दाद द्यावीच लागेल. परीक्षा घेतल्या जाणार नाहित हा निर्णय अगदि शेवटी घेतला गेला होता त्यामुळे मुलांनी आता मिळवलेले गुण हे फुकटचे आहेत असे कोणीहि म्हणू नये.

    या वर्षातील त्यांची मानसिक स्थितीसुद्धा लक्षात घ्यावी. काहि दुर्दैवी मुलांनी तर जॉब घालवून घरात बसलेले बाबा, कोविड सेंटरमध्ये १५ दिवस विलगीकरणात गेलेले पालक, जवळचे गमावलेले नातेवाईक असे आघातसुद्धा सहन केले होते.

    कौतुकाची थाप हवीच


    अशा एकूण परिस्थितीत सर्व यशस्वी विद्यार्थ्यांचे कौतूक केलेच पाहिजे. नेहमीप्रमाणे प्रत्येक विद्यार्थ्यांचे योग्य मुल्यमापन कदाचित झाले नसेलहि परंतु या मिळवलेल्या गुणांचे महत्व त्यामुळे कमी होत नाहि. काहींना अपेक्षेहून जास्त तर काहि प्रामाणिक कष्ट केलेल्या मुलांवर अन्यायसुद्धा झाला असेल पण प्राप्त परिस्थितीत दूसरा कोणता ईलाजहि नाहि हे सुद्धा समजून घेतले पाहिजे. या कोवळ्या मनांना उभारी देण्याचे काम आपणच करायला हवे.

    त्यांच्या मनात कोणताहि प्रकारचा न्यूनगंड निर्माण होणार नाहि याची काळजी आपण घेतली पाहिजे. त्यांच्या पुढील यशस्वी कारकिर्दीसाठी त्यांना शुभेच्छा द्यायला पाहिजे. कौतूकाचा पेढा त्यांच्या तोंडात भरवलाच पाहिजे आणि त्यांच्या पाठीवर पडणारी कौतुकाची थाप कुठेही कमी पडणार नाहि याची काळजी सुद्धा घ्यायलाच पाहिजे.

    👍💐

  • जयशंकर व मेवाड हॉटेल – आश्चर्यकारक संबंध !


    मेवाड हॉटेल – औरंगाबाद स्पेशल !

    औरंगाबाद मधील गुलमंडी वरील मेवाड हॉटेल कुणाला माहिती नसेल असा जुन्या पिढीतला किंवा अलीकडच्या पिढीतला माणूस विरळच. …


    अजीब दास्ताॅं है ये कहां शुरु कहां खतम….
    असं या मेवाड हॉटेलच्या इतिहासाबाबत किंवा माहितीबाबत म्हणता येईल ! आश्चर्यचकित करून टाकणाऱ्या दोन व्यक्तींचा उल्लेख मेवाड हॉटेलच्या माहितीबद्दल किंवा इतिहासा बद्दल येथे मांडण्याचा प्रयत्न आहे. मला असलेल्या माहितीत भर टाकताना अनेक गोष्टींची शहानिशा व‌ आमचे मित्र, मेवाड लॉजचे मालक शंकर परमानंदसेठ जोशी तसेच सोमण शास्त्री यांचे नातेवाईक सुभाष आपटे ( माजी व्यवस्थापक – देवगिरी ना.सह. बॅंक) यांच्या कडूनही झाली आहे.

    मध्यप्रदेशातील इंदोरच्या होळकरांकडे भांडारकर नावाचे गृहस्थ मोठ्या पदावर होते. या भांडारकरांकडे एक हिंदी भाषिक जोशी व्यक्ती रसोईची म्हणजे स्वयंपाकाची व्यवस्था पाहत होते. या जोशींचा मुलगा म्हणजे परमानंद जोशी. परमानंद जोशीं वडिलांबरोबर भांडारकरांच्या घरातील एक लहान सदस्यच झाला होता. ह्या मुलाला तेथे राहण्याचा आणि काम करण्याचा कंटाळा आला म्हणून इंदूर सोडून आला तो औरंगाबादला !
    रेल्वे स्टेशन वरील सूर्यप्रकाश नावाच्या एका हॉटेलमध्ये त्यांला काम मिळालं. याच हॉटेलमध्ये मोतीवाला हुंडेकऱ्याच काम पाहत होते. गुलमंडीवर एक पोलिस इन्स्पेक्टर हॉटेल चालवत होता. ओळखी ओळखीतून त्यांच्या हॉटेलमध्ये परमानंद जोशी कामाला लागले. या तरूण मुलामधील चमक आणि प्रामाणिकपणा पाहून हॉटेल मालकाने त्याला बीन भांडवली २५ टक्क्यावर working partner करून घेतले. प्रामाणिकपणा, सचोटी आणि व्यवसायिक हुशारीच्या बळावर परमानंद जोशींनी ही भागीदारी ५० टक्क्यांपर्यंत नेली.

    हैदराबाद मुक्तिसंग्रामाचे वारे जोरात वाहत होते. गुलमंडीचे ठिकाण औरंगाबादच्या केंद्रस्थानी असल्यामुळे येथे अनेक सभा, चळवळी व्हायच्या. हा भाग तेव्हा जवळपास अशांतच असायचा. अशा मध्ये १९४७ साली या हॉटेल जवळ कृष्णा नावाच्या एका तरुणाचा निजामाच्या रोहिल्यांनी खून केला. या कृष्णाच्या अंत्ययात्रेला औरंगाबाद मधील दहा हजार लोक त्यावेळेस हजर होते असे म्हणतात. गुलमंडीवरचं वातावरण तंग असायचं. अशात हॉटेल दोन तीन महिने बंद राहिलं. परमानंद सेठनी मोठ्या हिमतीने आपल्या एका मित्राच्या भागीदारीत हे हॉटेल पूर्णपणे चालवायला घेतले. हे भागीदार होते जगन सेठ. तरी पण हॉटेल काही केल्या चालेना.

    पूर्वी मुंबईमध्ये ट्राम सिटीबस सारख्या चालायच्या. मुंबईच्या या ट्राम मध्ये सोमण शास्त्री नावाचे गृहस्थ कंडक्टर म्हणून काम करत होते. काम करता करता त्यांच्या मनात विरक्तीची भावना आली. निवृत्ती स्वीकारली. आपल्या जवळ असलेलं सगळं दान करून काही अल्प-स्वल्प किमतीत विकून या गृहस्थांनी भारत भ्रमण सुरू केलं. भारतभर फिरून ते औरंगाबादला विसावले. संपूर्ण भारत पालथा घातल्यामुळे सोमण शास्त्रीं कुठल्याही गावाची, तेथील स्थळाची माहिती, त्या गावचे वैशिष्ट्य अतिशय व्यवस्थितपणे सांगायचे. आपल्या या संतांच्या भूमीचा, मातीचा गुणच असा काही आहे की एखाद्या माणसांमध्ये असलेले सद्गुण, दैवी भावना येथे आल्यावर अधिक दृढ होत जातात, उपकारक होत जातात असा इतिहास आहे.
    केसरसिंग पुऱ्यातील (जिल्हा न्यायालया मागे) महादेव मंदिरात या सोमण शास्त्रींनी आश्रय घेतला. पूजा, अर्चा ध्यान आणि प्रबोधन असं कार्य सुरू झालं.

    मेवाड हॉटेल पाहिजे तसं चालत नव्हतं यासाठी काय करावं या विवंचनेत परमानंद सेठ असताना कुणा एका व्यक्तीने त्यांना सोमण शास्त्रींंना भेटण्याचा सल्ला दिला. आणि सांगितलं की या व्यक्तीने जर तुम्हाला राम राम केला तर तुमचा ऊद्धार ठरलेला आहे. परमानंद सेठ सोमण शास्त्रींकडे गेले. त्यांच्यासमोर हात जोडण्याच्या आधीच सोमण शास्त्रींनी त्यांना राम राम केला. परमानंद सेठनीं त्यांना त्यांच्या हॉटेलवर येण्यासाठी आग्रह केला. सकाळी चार वाजता जेव्हा हॉटेल उघडाल तेव्हा मी तेथे येऊन बसतो असे ते म्हणाले.

    दिव्यत्वाची प्रचीती

    दिव्यत्वाची प्रचिती आल्या प्रमाणे परमानंद सेठनी सकाळीच चार वाजता हॉटेल उघडले ‌ आणि समोर गुडघ्यापर्यंत नाडीची विजार घातलेले (आजच्या बरमोडा सारखी), खांद्यावर एक शुभ्र पांढरा पंचा असलेले सोमण शास्त्री दत्त म्हणून तेथे आधीच हजर होते. परमानंद सेठनी त्यांना थेट गल्ल्यावरच बसवले. गल्ल्यावर बसल्या बसल्या गुलमंडी भागातील एक गृहस्थ, खांडरे हे चहा प्यायला हॉटेलमध्ये आले. त्यांना चहा दिल्यावर ते बिल द्यायला काउंटरवर गेले तर सोमण शास्त्रींनी त्यांना नमस्कार केला आणि सांगितलं रोज सकाळी येऊन आपण चहा प्यायचा आणि बिल द्यायचं नाही.
    परमानंद सेठ मागच्या बाकावर बसून कुठल्याशा नवीन दिव्यत्वाचा साक्षात्कार घेत होते. साधारण साडेसात आठ वाजेपर्यंत सोमण शास्त्री ‘जय शंकर, जय शंकर’ म्हणत गल्ल्यावर बसले होते. काम करणाऱ्यांची धावपळ चालू होती कारण गिर्‍हाईकांची वर्दळ वाढली होती. सोमण शास्त्रींनी गल्ल्यावरून हात फिरवला आणि जय शंकर म्हणत ते तडक निघून गेले. जाताना रात्री येतो म्हणून सांगून गेले.


    रात्री दहा साडेदहा वाजता आल्यावर त्यांच्या हातात एक लोह चुंबक होते. त्या लोहचुंबकाने त्या काळी असलेली नाणी (खुर्दा – सुटे पैसे) वेगळे करत रात्री अकरा वाजता त्यांनी ती पूर्ण रक्कम ‘जय शंकर, जय शंकर’ म्हणत समोर मोजून मांडून ठेवली. परमानंद सेठ आणि जगन सेठचा स्वतःच्या डोळ्यांवर विश्वास बसेना. डोळ्यात तरळलेल्या अश्रूंसह त्यांनी सोमण शास्त्रींना नमस्कार केला.

    शंकर महाराज

    सोमण शास्त्री जय शंकर जय शंकर म्हणत टांग्याबिंग्याची वाट न पहाता किंवा अपेक्षाही न करता पायी निघून गेले. आता सोमण शास्त्रींना सगळे जयशंकर महाराज म्हणू लागले होते.
    हॉटेलमधील गिऱ्हाईकी वाढली. रोज सकाळी खांडरे येऊन चहा पिऊन जायचे. जय शंकर महाराजांना नमस्कार करायचे आणि त्यांचाही नमस्कार स्वीकारायचे.
    हा शिरस्ता खूप दिवस चालू होता. खाण्यापिण्याची कुठलीही इच्छा जयशंकरजींनी कधी व्यक्त केली नाही.
    एक दिवस हॉटेलमध्ये जिलेबी तयार झाली. महाराज जिलेबी खाणार का? असं विचारल्यावर त्यांनी ताज्या जिलेबीची थाळी समोर ठेवायला सांगितलीआणि त्यांनी ती सगळी जिलेबी संपवून टाकली. कोणी काही बोललं नाही. महाराज हसत म्हणाले अरे आता गिऱ्हाईकासाठी जिलेबी संपली ! दोघं मालक म्हणाले महाराज आपण दुधाने अंघोळ केली तरी आम्ही काही म्हणणार नाही!!

    एखाद्या सद्-गृहस्थाची कृपा, सद्भावना म्हणा किंवा त्यांच्यातील निर्मळ दिव्यत्व असो, ते कुणाच्या तरी प्रगती, समृद्धीचा दुवा असते, फळ ठरते! फक्त असावी लागते ती तुमची निष्ठा, आदर अन् विश्वास !!
    गुलमंडी वरील मेवाडचा कारभार, व्यवसाय ऊभारी घेऊ लागला होता. सत्तर-ऐंशी लोक काम करू लागले होते. हॉटेलचे व्यवस्थापन उत्तम जमले होते. तसेच कामगारांमध्ये शिस्त रुजवली गेली होती. प्रत्येकाला आपल्या जबाबदारीची कल्पना होती. मला आठवतं विठ्ठलराव सपकाळ नावाचे सडपातळ पण कडक स्वभावाचे गृहस्थ सगळीकडे लक्ष ठेवून सारखे हॉटेलभर फिरत असत. काम करणाऱ्या मुलांना गिऱ्हाईकाला काय हवं काय नको पासून साफसफाई व बारीक सारीक गोष्टींची जाणीव करून देण्यात ते तत्पर होते. सुपरवायझरच म्हणा ना ! अजून एक गृहस्थ कधी प्रवेशद्वारा जवळ कधी मागच्या बाजूला निघणाऱ्या दाराजवळ शांतपणे लक्ष ठेवून उभे असायचे. त्यांचं नाव होतं खेडला. परमानंदसेठ पासून त्यांचे चिरंजीव शंकरसेठनी व्यवसाय पाही पर्यंत ते नेहमी बरोबर असतं. नागेश्वर वाडीत मेवाड लॉज शेजारच खेडलानी स्वतःचं मोठ घर आहे. तसेच मुलांनी छान दुकान थाटली आहेत.
    वरील विवेचवा वरून मेवाड हॉटेलची व्यवस्था अतिशय अनुकरण करण्यासारखी होती हे लक्षात आलंच असेल. खरोखर हे व्यवस्थापन समजून घेण्यासाठी वा अभ्यास करण्यासाठी, बरेच जण, मॅनेजमेंट तज्ञ या हॉटेलच्या मालकांना भेटायचे. व्यवस्थापना बद्दल विचारायचे. या व्यवस्थापन परंपरेतून किंवा या हॉटेल मधिल व्यवस्थापनाचे तंत्र अवगत झालेल्या बऱ्याच जणांनी, काम करणाऱ्यांनी औरंगाबाद मध्ये व आसपासच्या गावांमध्ये स्वतंत्र हॉटेल्स टाकले.
    मालकांना कामगारांबद्दल आत्मीयता तर होतीच तसाच त्यांच्यावर वचक पण होता. या हॉटेलमध्ये कधी संप झाल्याचे मी ऐकले नाही.
    श्रावणातील एका सोमवारी मेवाड हॉटेलमध्ये सत्यनारायणाची पूजा, तिर्थ-प्रसाद असायचा. शंकर जोशींनी नागेश्वर वाडीत मेवाड लॉज सुरू केल्यावर श्रावणातील पूजा आणि ओळखीच्या मित्र-मंडळीसाठी भोजन सुरू केले.

    परलोक गमन


    सोमण शास्त्री-जयशंकरजींच्या परिचयातील औरंगाबाद मधिल रामभाऊ दातार, आपटे खानावळ, कुंभार वाडा, रामभाऊ जोशी, अभ्यंकर. इत्यादी कुटुंबातील सदस्यांनाही त्यांचे मार्गदर्शन, आशीर्वाद व त्यांची सेवा करण्याची संधी मिळाली. शेवटी रामभाऊ जोशी, स.भु. कॉलनी, यांच्या घरीच १९७८-७९ (अंदाजे) सोमण शास्त्रींनी देह ठेवला. त्यांचे अजून एक निकटवर्तीय दत्तात्रय खांबेटे यांनी अन्य सर्व संस्कार केले.
    एका अज्ञात देवमाणसाने औरंगाबाद मध्ये येऊन निरपेक्ष वृत्तीने जमेल तशा प्रकारे आपली दिव्य शक्ती प्रामाणिकपणे प्रयत्न करण्याची भावना, धारणा असणाऱ्यांचे बस्तान बसवण्यासाठी वापरावी हे आश्चर्यकारक व अप्रुपच वाटत नाही का?

    दिव्यत्वावरची श्रद्धा आणि श्रद्धेचं फळ म्हणजे मेवाड हॉटेल!

    आपण सर्वांनी या अमृततुल्य हॉटेलमध्ये घेतलेल्या चहा पासून दाक्षिणात्य व अन्य पदार्थांचा, जेवणाचा घेतलेला आस्वाद काही औरच होता!
    पुढे या भागिदारांनी शहागंज भागातही मेवाड हॉटेल सुरू केले. ‘मेवाड’ हा शब्द जणू खाण्यापिण्याचं एक विश्वसनीय प्रतिक ठरलं होतं. स्वादिष्ट – चवदार पदार्थ, स्वच्छता-नीटनेटकेपणा व माणुसकीचे ठिकाण ही ठरलं! नागेश्वर वाडीतील मेवाड लॉज हे परमानंद सेठचे अजून एक नंतरचे प्रतिष्ठान. पुढच्या पिढीने, दोन्ही भागीदारांच्या नात्यातील व्यक्तींनी ‘मेवाड’ हा शब्द अंतर्भूत धरून नवनवीन हॉटेल्स वेगवेगळ्या भागात सुरू केली. या व्यवसायाने दोघा भागीदारांच्या पिढ्यांना समृद्ध केलं. आज गुलमंडीवरचे मेवाड नसले तरी मेवाड हॉटेल मधील पदार्थांची चव आणि आठवणी मनात कायम आहेत.



    या बद्दल अधिक माहिती असणारांनी जरूर टाकावी. कमेंटमध्ये

  • नकारात्मक प्रभाव

    नकारात्मक प्रभाव

    असं का होतं की ज्या गोष्टीची भीती असते, तीच गोष्ट आयुष्यात दत्त म्हणुन हजर होते.
    एखाद्या विषयाची सतत भीती बाळगणारा विद्यार्थी, त्या विषयात नापासचं होतो,
    पैसे नाहीत, पैसे नाहीत, अशी चिंता करणारा का दिवसेंदिवस अधिकाधिक कंगाल होतो?
    आर्थिक नुकसान होईल, अशी सतत भीती बाळगणार्‍याला कसलातरी फटका बसतोचं बसतो,
    कष्ट नकोत, कष्ट नकोत, घोकणार्‍याच्या नशिबात श्रम आणि राबणंचं असतं,
    का बरं एखादीला नको असलेलं गावच ‘सासर’ म्हणुन पदरात पडतं?
    का श्रीमंत अधिकाधिक श्रीमंत होतात आणि गरीब अधिकाधिक गरीब होतायतं?

    तर ह्या सगळ्यांना एक कारण आहे,
    आणि ते कारण आहे

    आकर्षणाचा नियम, द लॉ ऑफ अट्रॅक्शन..

    तुम्हाला माहीतीय?...जगातील फक्त एक टक्का लोकांकडे एकुण संपत्तीच्या शहाण्णव टक्के संपत्तीचा हिस्सा आहे. हा योगायोग नाही, हा आकर्षणाचा नियम आहे. काय सांगतो हा नियम? तुमच्या आयुष्यात असलेली प्रत्येक गोष्ट ही कळत नकळत तुम्हीच आकर्षित केलेली आहे, जसं की तुमचं दिसणं, तुमचे कपडे, तुमचा जोडीदार, तुमची मुलं, तुमचे मित्र, तुमचं घर, तुमचा व्यवसाय, तुमची सांपत्तीक स्थिती, तुमचं गाव, तुमच्या आवडीनिवडी, तुमचे नातेसंबंध, अगदी सगळं…सगळं… जसं की समजा एखाद्याला निळा रंग आवडतो, आणि त्याच्याकडे निळ्या रंगाचे खुप कपडे आहेत, तर तो बाहेर जाताना निळाच शर्ट घालुन जाईल, तसंच, आपल्या मनाच्या कपाटात ज्या रंगाचे विचार असतात, तीच परिस्थीती वास्तव बनुन समोर येते. *उदा.* माझं कर्ज कसं फिटेल याची सतत चिंता असेल तर मनाचा फोकस कर्जावर जातो तर कर्ज वाढतं.

    माझं वजन वाढतयं, म्हटलं की वजन अजुन वाढतं,
    माझे केस गळतायत म्हटलं की अजुनच केस गळतात,
    माझं लग्न जमत नाही म्हणलं की लग्न जमायला अजूनच उशीर होतो,
    कर्ज माझा जीव घेणार म्हणलं की अजून अडचणी निर्माण होतात,
    वगैरे वगैरे…

    ज्या गोष्टीवर मन, लक्ष केंद्रित करतं, ती गोष्ट घडते.

    म्हणजे जर आपण आपल्याला जे हवं ते आपल्याला मिळालयं अशी कल्पना करुन, मनाला उत्तेजित अवस्थेत नेलं आणि त्यावर विश्वास ठेवला, की हवं ते आपल्याला मिळतचं मिळतं.

    फक्त आपल्याला ते मिळालयं, हे मनाला पटवुन देता यायला हवं. मरणाच्या दारात पोहचलेली, डॉक्टरांनी आशा सोडून दिलेली पण हे रहस्य जाणणारी, अनेक माणसं फक्त ह्या शक्तीचा वापर करुन आणि सकारात्मक कल्पना करुन आणि त्यावर विश्वास ठेऊन पुन्हा ठणठणीत बरी झाली.

    विश्वातील सर्वच थोर माणसांनी हे आकर्षणाचं रहस्य जाणलं होतं आणि त्याची अंमलबजावणी केली, म्हणुन तर ते इतरांपेक्षा वेगळे ठरले. तुम्हालाही तुमच्या आयुष्यात सुख समृद्धी समाधान हवं असल्यास, रोज सकाळी मस्त तयार होवुन आरशासमोर उभे राहुन, चेहर्‍यावर स्मितहास्य ठेवुन, मोठमोठ्याने अशी वाक्ये जोरजोरात म्हणा!..

    1) मी हवा तेवढा पैसा आकर्षित करु शकतो, मी शक्तीशाली आहे.
    2) माझ्यात जग बदलण्याची शक्ती आहे.
    3) माझ्या भावना नियंत्रित करण्याचा अधिकार मलाच अहे, आणि आज मी आनंदात रहायचे ठरवले आहे.
    4) माझ्या आई-वडीलांना, माझ्या परीवाराला माझ्यावर, गर्व आणि अभिमान वाटेल, असे एक काम मी आज करणार आहे.
    5) मी प्रचंड आत्मविश्वासाने भरलेला असुन, प्रचंड संपत्तीवान आहे.
    6) मी एका प्रसन्न व्यक्तीमत्वाचा मालक असुन, संपर्कात आलेल्या प्रत्येकाला मी भरभरुन आनंद वाटतो. खळखळुन हसवतो.
    7) परिस्थीतीला हरवण्याची माझ्यात हिंमत आहे. मी परीस्थीतीवर सहज मात करु शकतो.
    8) माझ्या जिद्दीला भिऊन संकटे दुर पळुन जातात.
    9) मी आयुष्याच्या प्रत्येक लढाईचा यशस्वी सामना केला आहे, आणि ती जिंकली आहे.
    10) माझ्या आजुबाजूचे, अवतीभवती वावरणारे, सर्व लोक माझ्यावर खुप प्रेम करतात, आणि मी ही त्यांच्यावर खूप खूप प्रेम करतो.
    11) मी आतापर्यत माझी बरीचशी स्वप्ने पुर्ण केली आहे, आणि माझी उरलेली स्वप्ने लवकरचं पुर्ण होणार आहेत.
    12) मी सतत आनंदी असतो. मला रोज नवनव्या कल्पना सुचतात, आणि मी तात्काळ त्यांना अंमलात आणतो.
    13) मी निरोगी आहे,
    14) आयुष्यात प्रत्येक चांगल्या गोष्टीसाठी मी आभारी आहे.
    15) मी निसर्गाची अद्वितीय कलाकृती आहे.

    याला पॉझीटीव्ह अफैर्मेशन्स म्हणा, सकारात्मक स्वयंसुचना म्हणा, यामुळे दिवसभर एक आगळीवेगळी उर्जा तुमच्यामध्ये संचार करेल

    तुम्ही हे जर मनापासुन, फील करुन बोललात, आणि ते तुमच्या सुप्त मनापर्यंत पोहोचलं, तर तुमच्या नकळत ते तुमच्या सार्‍या आज्ञा पाळेल आणि खर्‍या करुन दाखवेल.

    आणि हीच एका दृष्टीने
    “लॉ ऑफ अट्रॅक्शन”
    ची दणदणीत सुरुवात असेल!..

    ही आणि अशी प्रत्येक वाक्ये तुम्हाला अधिकाधिक शक्तीशाली आणि आनंदी बनवो.
    ➖➖🙏🏻🌹🌹🙏🏻➖➖